कलयुग

कलयुग के इस भव सागर को,
कैसे कोई पार करे ?
कोई दैवीय शक्ति मिले,
जो इन सब से उध्दार करे।

ह्रदय की वेदना बोली,
लहू बन इन लोचनों में।
घनघोर इस अंधकार में,
दिखे न कोई एक किरण।
हवा देश की बदल गयी है,
कैसे कोई सांस भरे!
कोई दैवीय शक्ति मिले ,
जो इन सब से उध्दार करे

माया के इस मोहक वन की,
क्या हम कहें कहानी !
घूम रहे सिर पर लिए ,
विश्व अभिशाप की निशानी ।
टिक सके न एक पल मित्र पुत्र,
माता से नाता तोड़ चले ।
कलयुग के इस भव सागर को,
कैसे कोई पार करे !
कोई दैवीय शक्ति मिले ,
जो इन सब से उध्दार करे ।

वासना को ही सुख मान जिसने बैठा है,
काल ने भी उसी की आज गर्दन ऐठा है।
अब उथला सरिता का प्रवाह कैसे नौका पार करे,
कोई दैवीय शक्ति मिले जो इन सब से उध्दार करे।

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