निर्धन पल

देखी है हमने ,गरीबी के निस्तब्ध पल,
उन छोटी खुशियों के, ओझल छल।
निर्द्वन्द के द्वंद में ,जीने की द्वन्द,
चुन चुन कर ,खुशियों के जीने का छंद।
वस्त्र न्यूनता ,भोज न्यूनता और पीड़ित हृदय कक्ष,
पर समृद्ध वाचक था, वो निर्धनता दक्ष।
चक्षुसह अन्याय हुआ ,सहन था ममत्व का ,
बलान्कुर हुआ न्याय का ,उपज था सम्मान का।
सहिष्णुता सम, सार्थक प्रयास था,
सम वर्तन, धन कर्तन ,अभाव था।
ह्रदय सागर सम , स्नेहातुर था,
भार कार्य ,कृति ,श्रम चातुर्य था।


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