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पढ़ें और जानें 7 ऐसे Truths… जो कोई नहीं बताता (Life Truths in Hindi | Eye-Opening Article)

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ज़िंदगी हमें बहुत कुछ सिखाती है, लेकिन कुछ सच ऐसे होते हैं जो न स्कूल सिखाता है, न समाज खुलकर बताता है। ये वो कड़वे लेकिन ज़रूरी Truths हैं, जो अगर समय रहते समझ आ जाएँ, तो इंसान टूटने से बच सकता है। 1️⃣ मेहनत हमेशा तुरंत सफल नहीं बनाती बचपन से हमें सिखाया जाता है कि “मेहनत करो, सफलता ज़रूर मिलेगी।” सच यह है कि कई बार सबसे ज़्यादा मेहनत करने वाला सबसे ज़्यादा इंतज़ार करता है। 👉 Truth: मेहनत बेकार नहीं जाती, लेकिन उसका फल हमेशा जल्दी नहीं मिलता। 2️⃣ हर मुस्कुराने वाला आपका अपना नहीं होता ज़िंदगी में बहुत से लोग आपसे मीठी बातें करेंगे, लेकिन मुश्किल समय में गायब हो जाएँगे। 👉 Truth: कम लोगों पर भरोसा करें, और हर किसी को अपनी कमजोरी न बताएं। 3️⃣ अकेलापन डरने की चीज़ नहीं है लोग अकेले रहने से डरते हैं, लेकिन सच यह है कि अकेलापन इंसान को मज़बूत बनाता है। 👉 Truth: अकेले रहकर ही इंसान खुद को समझना सीखता है। 4️⃣ पैसा सब कुछ नहीं, लेकिन बहुत कुछ है लोग कहते हैं— “पैसा खुशियाँ नहीं लाता।” लेकिन बिना पैसे के इलाज, सम्मान और आज़ादी तीनों अधूरे रह जाते हैं। 👉 Truth: पैसा बुरा नहीं, पैसे की समझ न ...

गाँव से निकलकर CEO बनने वाला युवा (Inspirational Success Story in Hindi)

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  “जहाँ सड़कें कच्ची हों,  वहाँ सपनों को पक्का बनाना पड़ता है।” यह कहानी है एक ऐसे युवा की, जिसने गाँव की मिट्टी से निकलकर कंपनी की ऊँची कुर्सी तक का सफर तय किया। यह कहानी है संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की। 🌾 गाँव, गरीबी और सपने देश के एक छोटे से गाँव में जन्मा अमन (नाम बदला हुआ) एक किसान परिवार से था। उसका घर कच्चा था, छत से बारिश टपकती थी, और बिजली अक्सर गायब रहती थी। लेकिन अमन की आँखों में एक अलग चमक थी। वह अक्सर कहता था— “मैं भी कुछ बड़ा बनूँगा।” 💔 जब हालात हँसते हैं सपनों पर पिता खेतों में मजदूरी करते थे। माँ घर और बच्चों को संभालती थीं। गाँव के लोग कहते— “इतनी पढ़ाई करके क्या मिलेगा? आखिर किसान ही तो बनना है।” ये बातें अमन को तोड़ती नहीं, बल्कि और मज़बूत बनाती थीं। 📚 लालटेन की रोशनी में भविष्य लिखा ✔ दिन में स्कूल ✔ शाम को खेतों में काम ✔ रात को लालटेन में पढ़ाई कई बार किताबें पुरानी होतीं, कॉपी पूरी नहीं होती, लेकिन हौसला पूरा था। 10वीं और 12वीं में उसने गाँव में टॉप किया। 🏙️ शहर की ठंडी हवा और कड़वी सच्चाई कॉलेज के लिए शहर पहुँचा तो दुनिया बिल्कुल बदली हुई थी। ❌ अ...

Life Lessons You Didn’t Learn in School स्कूल में नहीं सिखाए गए ज़िंदगी के सबसे ज़रूरी सबक

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 Life Lessons You Didn’t Learn in School  स्कूल में नहीं सिखाए गए ज़िंदगी के सबसे ज़रूरी सबक स्कूल हमें किताबों का ज्ञान देता है, लेकिन ज़िंदगी हमें अनुभवों से सिखाती है। अंक, डिग्री और सर्टिफिकेट ज़रूरी हैं, लेकिन कुछ ऐसे Life Lessons हैं जो स्कूल की किसी किताब में नहीं मिलते, फिर भी वही सबक हमें असली सफलता और खुशी सिखाते हैं। 1️⃣ हर कोई आपका दोस्त नहीं होता स्कूल में हमें सिखाया जाता है कि सब अच्छे होते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में हर मुस्कुराता चेहरा आपका भला नहीं चाहता। 👉 सबक: भरोसा धीरे-धीरे करें, हर किसी को अपनी कमजोरी न बताएं। 2️⃣ असफलता हार नहीं होती स्कूल में फेल होना सबसे बड़ी हार मानी जाती है, लेकिन जीवन में Failure ही सबसे बड़ा Teacher होता है। 👉 सबक: जो गिरकर उठना सीख गया, वही आगे चलकर जीतता है। 3️⃣ पैसा ज़रूरी है, बुरा नहीं स्कूल में पैसे की बात कम सिखाई जाती है, लेकिन ज़िंदगी में आर्थिक समझ बहुत ज़रूरी होती है। 👉 सबक: पैसा कमाना गलत नहीं, गलत है पैसे का सही उपयोग न जानना। 4️⃣ हर मेहनत का फल तुरंत नहीं मिलता स्कूल में परीक्षा का रिज़ल्ट जल्दी मिल जाता है, लेकिन ...

एक गरीब लड़की की प्रेरणादायक कहानी | बिना पैसे के कॉलेज फंड कैसे बनाया?

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 एक गरीब लड़की जिसने बिना किसी पैसे के कॉलेज फंड बनाया (Inspirational Story in Hindi | Best Motivational Story) “हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ते अपने-आप बन जाते हैं।” यह कहानी है एक ऐसी गरीब लड़की की, जिसके पास न पैसा था, न पहचान… लेकिन उसके पास था हौसला, मेहनत और खुद पर भरोसा। 🌸 सपनों से भरी एक गरीब लड़की गाँव के एक छोटे से घर में रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) एक साधारण परिवार से थी। पिता मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में बर्तन माँजकर घर चलाती थीं। सीमा पढ़ने में बहुत तेज थी। उसका सपना था — कॉलेज जाकर पढ़ाई करना। लेकिन समस्या सिर्फ एक थी… 👉 पैसे। 💔 जब सपने टूटने लगे 12वीं में अच्छे नंबर आने के बाद जब कॉलेज की बात आई, तो पिता की आँखें झुक गईं। उन्होंने कहा — “बेटी, फीस भरने के लिए पैसे नहीं हैं…” सीमा उस दिन बहुत रोई। लेकिन उसी रात उसने एक फैसला लिया। 👉 “अगर कोई मुझे पैसे नहीं देगा, तो मैं खुद अपने कॉलेज का फंड बनाऊँगी।” 🔥 बिना पैसे के शुरुआत सीमा के पास मोबाइल भी पुराना था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने क्या किया? ✔ गाँव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ान...

मकर संक्रान्ति : पर्व, परम्परा और सामाजिक समरसता

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🇮🇳 भारत उत्सवधर्मी राष्ट्र है 🎉 प्रकृति को आधार बनाकर यहाँ वर्षभर व्रत, त्योहार और पर्व मनाए जाते हैं। कुछ उत्सव धार्मिक 🙏 होते हैं, कुछ प्राकृतिक 🌿, कुछ ऐतिहासिक 📜 तथा कुछ राष्ट्रीय 🇮🇳। ये सभी पर्व हमारी अस्मिता को पुष्ट करते हैं और शरीर, मन व जीवन में नई चेतना ✨, उत्साह 💫 और उमंग 🌸 का संचार करते हैं। ऐसा ही एक महान पर्व है — मकर संक्रान्ति ☀️🪁 ☀️ मकर संक्रान्ति का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व पौष मास में आने वाले इस दिन भगवान सूर्य 🌞 धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायण का प्रारम्भ होता है। 🌙 रात्रियाँ छोटी होने लगती हैं और 🌄 दिन बड़े होने लगते हैं। 🔥 सूर्य की उष्मा प्रखर होती है और 🌟 अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश मिलता है। यह परिवर्तन केवल प्रकृति में ही नहीं, बल्कि मानव जीवन में भी अज्ञान से ज्ञान 📖 और नकारात्मकता से सकारात्मकता 🌈 की ओर अग्रसर होने का प्रतीक है। 📜 शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि 🌌 तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन 🌞 कहा गया है। इसी कारण उत्तरायण को अत्यंत पुण्यकाल माना गया...

अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति, मानवता और कविता का संगम

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 अटल बिहारी वाजपेयी : राजनीति, मानवता और कविता का संगम अटल बिहारी वाजपेयी जी ने राजनीति के शिखर पर पहुँचकर भी अपने जीवन के मानवीय मूल्यों को कभी स्वयं से दूर नहीं किया। वे केवल एक प्रभावशाली और प्रगतिशील राजनेता ही नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील, नेक इंसान और महान कवि भी थे। उनकी प्रसिद्ध काव्य पंक्तियाँ — “हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा” और “काल के कपाल पर लिखता ही जाता हूँ” आज भी करोड़ों लोगों को संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की प्रेरणा देती हैं। इस लेख के माध्यम से हम अटल जी के जीवन के कुछ अनछुए, मानवीय और प्रेरणादायक पहलुओं को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं। 👤 जीवन परिचय पूरा नाम: अटल बिहारी वाजपेयी जन्म: 25 दिसंबर 1924, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) पिता: श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी माता: श्री कृष्णा देवी शिक्षा: राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर 🏛️ राजनीतिक सफर अटल बिहारी वाजपेयी जी पहली बार 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। वे भारत की राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से थे, जो— चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं और चौदहवीं...

प्रेमानंद महाराज जी के अनमोल विचार | Premanand Maharaj Quotes in Hindi

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प्रेमानंद महाराज जी के श्रेष्ठ अनमोल विचार परिचय प्रेमानंद महाराज जी के विचार जीवन को धर्म, संयम, सेवा और आत्मिक शांति की दिशा में ले जाते हैं। उनके वचन न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाते हैं बल्कि व्यवहारिक जीवन को भी संतुलित बनाते हैं। नीचे प्रस्तुत हैं उनके प्रेरणादायक, सारगर्भित और जीवन बदलने वाले अनमोल विचार। 🌼 प्रेमानंद महाराज के प्रेरणादायक विचार Quote 1 धर्म के अनुसार जीवन जियो, भोजन में संयम रखो, माता-पिता की सेवा को कर्तव्य मानो और राष्ट्र सेवा के लिए सदैव तत्पर रहो। Quote 2 जो बीत गया उसके लिए शोक मत करो। परिवर्तन से मत डरो, क्योंकि आगे आने वाला समय पहले से बेहतर भी हो सकता है। Quote 3 सत्य के मार्ग पर चलते हुए किया गया परिवर्तन ही उज्ज्वल भविष्य की नींव रखता है। Quote 4 सत्य का मार्ग कठिन होता है। निंदा और अपमान सहना पड़ता है, पर जब कर्म शुद्ध हो जाते हैं तो विरोधी भी सम्मान देने लगते हैं। Quote 5 दुर्भाग्य हमेशा साथ नहीं देता। निरंतर परिश्रम करते रहो, एक दिन वही हार मान लेगा। 🌸 जीवन, परिवार और चरित्र पर विचार Quote 6 माता जीवन की ममता है और पिता दिशा दिखाने वाला प...

सीख देने वाली और सरल हिंदी कहानियाँ

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 1. खामोश घड़ी की सीख एक छोटे से गाँव में अमित नाम का लड़का रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन उसे हमेशा लगता था कि उसकी मेहनत का कोई फल नहीं मिल रहा। परीक्षा हो या जीवन—हर जगह वह खुद को पीछे महसूस करता। एक दिन वह अपने दादाजी के पास गया और बोला, “दादाजी, मैं बहुत मेहनत करता हूँ फिर भी मेरी ज़िंदगी में कुछ बदलता नहीं।” दादाजी उसे कमरे में ले गए और दीवार पर टंगी एक पुरानी घड़ी दिखाते हुए बोले, “इस घड़ी को देख रहे हो? ये चल रही है, लेकिन आवाज़ नहीं करती।” अमित ने कहा, “हाँ, लेकिन इससे क्या?” दादाजी मुस्कराए और बोले, “जो चीज़ें शोर नहीं करतीं, वही सबसे ज़्यादा काम करती हैं। जैसे ये घड़ी—हर सेकंड अपना काम कर रही है, बिना दिखावे के।” उन्होंने आगे कहा, “तुम्हारी मेहनत भी ऐसी ही है। परिणाम आएगा, बस समय लगेगा।” उस दिन अमित ने समझा कि सच्ची मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। सीख: 👉 धैर्य और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी है। 2. गलती का बोझ रिया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी, लेकिन एक बार परीक्षा में उससे बड़ी गलती हो गई। वह इतना डर गई कि खुद को सबसे दूर करने लगी। उसे लगने लगा कि अब सब खत्म हो गया। उसकी ...

🎯 Students Permanent Motivation Lines (हर छात्र को रोज़ पढ़ने चाहिए)

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 🎯 Students Permanent Motivation Lines- (हर छात्र को रोज़ पढ़ने चाहिए) 🔥 CODE 1: खुद पर विश्वास अगर तुम खुद पर भरोसा नहीं करोगे, तो दुनिया के लाख भरोसे भी तुम्हें आगे नहीं बढ़ा पाएँगे। 👉 याद रखो: Average student नहीं, confident student जीतता है। 🔥 CODE 2: Discipline > Motivation Motivation आज है, कल नहीं भी हो सकती है। लेकिन discipline रोज़ तुम्हें पढ़ने बैठाएगा। 👉 जो रोज़ थोड़ा-थोड़ा करता है, वही एक दिन बहुत बड़ा करता है। 🔥 CODE 3: Comparison बंद करो तुम्हारी race किसी और से नहीं, तुम्हारे कल के version से है। 👉 दूसरों की speed मत देखो, अपनी direction सही रखो। 🔥 CODE 4: Failure से दोस्ती करो Fail होना हार नहीं है, Fail होना सीखने का रास्ता है। 👉 जो गिरने से डर गया, वो उड़ना कभी नहीं सीख पाएगा। 🔥 CODE 5: Time की इज्ज़त करो जो छात्र समय को हल्के में लेता है, समय उसे जिंदगी में हल्के में लेता है। 👉 आज पढ़ा गया एक घंटा, कल का आत्मविश्वास बनता है। 🔥 CODE 6: Mobile Control = Life Control मोबाइल तुम्हारा servant है, मालिक बन गया तो future चुरा लेगा। 👉 1 घंटा focus = 5 घंट...

पहले रोटी, फिर धर्म

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 पहले रोटी, फिर धर्म एक दिन स्वामी विवेकानंद जी भारत भ्रमण के दौरान एक गरीब बस्ती से गुजर रहे थे। चारों ओर गरीबी, भूख और लाचारी साफ़ दिखाई दे रही थी। उसी बीच उन्होंने एक कमज़ोर और भूखे बालक को सड़क किनारे बैठा देखा। उसके चेहरे पर दर्द था, आँखों में आँसू और शरीर में बिल्कुल भी ताकत नहीं। स्वामी जी रुके। उन्होंने उससे पूछा, “बेटा, क्या हुआ?” बालक ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “महाराज, दो दिन से कुछ खाया नहीं है… भूख बहुत लग रही है।” स्वामी विवेकानंद जी का हृदय भर आया। उनके साथ कुछ लोग थे, जो धर्म और अध्यात्म पर चर्चा करना चाहते थे। लेकिन स्वामी जी ने पहले अपना भोजन उस बच्चे को दे दिया। जब बालक ने खाना खाया, उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उसकी आँखों में चमक आ गई। तब स्वामी विवेकानंद जी ने कहा— “भूखे पेट भगवान की बातें करना पाखंड है। पहले रोटी दो, फिर धर्म की बात करो।” वे आगे बोले, “जिस देश में लोग भूखे हों, वहाँ सच्चा धर्म सेवा और करुणा है, केवल उपदेश नहीं।” उनका मानना था कि ईश्वर मनुष्य में ही वास करता है, और भूखे, दुखी, पीड़ित लोगों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। 🌼 कहानी से सीख सच्चा ...

डर पर विजय – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी

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 🔥 डर पर विजय – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी जब स्वामी विवेकानंद जी संन्यास लेने के बाद भारत भ्रमण कर रहे थे, तब वे कई जंगलों और दूर-दराज़ के इलाकों से होकर गुजरते थे। एक बार वे एक ऐसे जंगल से गुजर रहे थे जहाँ डाकुओं और जंगली जानवरों का बहुत डर माना जाता था। गाँव वालों ने उन्हें रोकते हुए कहा, “महात्मा जी, उस रास्ते से मत जाइए, वहाँ बहुत खतरा है।” लेकिन स्वामी विवेकानंद जी शांत भाव से मुस्कुराए और बोले, “जिसके मन में भय है, वही हारता है। डर बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है।” वे बिना रुके उसी रास्ते पर आगे बढ़ गए। जंगल में चलते समय उन्होंने देखा कि कुछ लोग भय से काँप रहे हैं। स्वामी जी ने उनसे पूछा, “तुम लोग इतने डरे क्यों हो?” लोगों ने कहा, “स्वामी जी, हमें लगता है कोई हमें नुकसान पहुँचा देगा।” स्वामी विवेकानंद जी ने दृढ़ स्वर में कहा, “तुम आत्मा हो, शरीर नहीं। आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता।” उनके शब्दों में इतना आत्मविश्वास था कि लोगों का डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा। कहते हैं, उस जंगल में आगे चलकर न कोई डाकू मिला, न कोई खतरा। 🌟 कहानी से सीख डर सबसे बड़ी कमजोरी है आत्मविश्वास...

🔥 शेर की दहाड़ – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी

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 🔥 शेर की दहाड़ – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी एक बार की बात है। युवा नरेंद्रनाथ दत्त (जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने) अपने जीवन को लेकर बहुत चिंतित थे। मन में सवाल था — “मैं कौन हूँ? मेरा जीवन उद्देश्य क्या है?” इन्हीं प्रश्नों के उत्तर की खोज में वे अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के पास पहुँचे। एक दिन गुरुजी ने नरेंद्र से कहा, “नरेंद्र, आज जंगल चलो।” जंगल में चलते-चलते गुरुजी ने अचानक पूछा, “मान लो, तुम्हारे सामने एक शेर आ जाए तो क्या करोगे?” नरेंद्र ने तुरंत कहा, “मैं डर जाऊँगा, भागने की कोशिश करूँगा।” गुरुजी मुस्कुराए और बोले, “नरेंद्र, असल में तुम खुद एक शेर हो, लेकिन तुम्हें यह भ्रम है कि तुम कमजोर हो।” फिर उन्होंने समझाया— “एक शेर अगर खुद को भेड़ समझ ले, तो जीवन भर डरता रहेगा। लेकिन जिस दिन उसे अपनी असली पहचान हो जाती है, उसी दिन उसकी दहाड़ से जंगल काँप उठता है।” यह बात नरेंद्र के हृदय में उतर गई। उसी दिन उन्हें एहसास हुआ कि कमज़ोरी बाहर नहीं, हमारे विचारों में होती है। समय बीतता गया। वही नरेंद्रनाथ आगे चलकर स्वामी विवेकानंद बने। उन्होंने पूरी दुनिया को एक ही संदेश...

“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”

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🔥 उठो, जागो और लक्ष्य तक पहुँचो – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा स्वामी विवेकानंद जी केवल एक संत नहीं थे, वे युवाओं के  आत्मविश्वास की आवाज़ थे। उनका मानना था कि हर इंसान के भीतर असीम शक्ति छुपी होती है, बस उसे पहचानने की ज़रूरत है। वे कहते थे — “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक ल क्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।” यह वाक्य सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की रणनीति है। 💪 खुद पर विश्वास ही सबसे बड़ी शक्ति स्वामी विवेकानंद जी का कहना था कि: “जो स्वयं पर विश्वास नहीं करता, वह ईश्वर पर भी विश्वास नहीं कर सकता।” जब आप खुद को कमजोर समझते हैं, तब आपकी शक्ति भी कमजोर पड़ जाती है। लेकिन जैसे ही आप अपने ऊपर विश्वास करना शुरू करते हैं, असंभव भी संभव बन जाता है। 🌱 असफलता से डरना मत विवेकानंद जी मानते थे कि: “एक बार असफल होना कोई हार नहीं है, बार-बार प्रयास न करना ही असली हार है।” हर असफलता हमें कुछ न कुछ सिखाने आती है। जो गिरकर उठना सीख लेता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है। 🔥 युवा शक्ति ही राष्ट्र की रीढ़ वे युवाओं से कहते थे: “मुझे कुछ ऐसे युवा दो, जो मजबूत हों, चरित्रवान हों, और निडर हों — मैं ...

आपकी मूर्ति कहाँ है

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                      आपकी मूर्ति कहाँ है सिकन्दर की राजधानी में एक सुन्दर बगीचा था। उसमें प्राचीन और  विद्यमान पराक्रमी पुरुषों की मूर्तियाँ खड़ी की गयी थीं। एक बार सिकन्दर की राजधानी देखने के लिए कोई बड़ी विदेशी आया। वह सिकन्दर का ही मेहमान था, अतः उसे शाही अतिथि गृह में ठहराया गया। सिकन्दर उसे अपना शाही बगीचा दिखाने के लिए अपने साथ ले गया। वहाँ रखी हुई मूर्तियों के बारे में मेहमान के पूछने पर कि यह किसकी मूर्ति है, सिकन्दर उसके बारे में उचित जानकारी देता। सारी मूर्तियाँ देखने के बाद मेहमान ने पूछा, “महाराज, आपकी मूर्ति कहीं भी दिखाई नहीं दी सिकन्दर ने जवाब दिया, “मेरी मूर्ति यहाँ रखी जाय और फिर अगली पीढ़ी यह प्रश्न करे कि यह मूर्ति किसकी है, इसकी अपेक्षा से बेहतर यह अधिक अच्छा लगेगा कि मेरी  मूर्ति ही न रखी जाय और लोग पूछे कि सिकन्दर की मूर्ति क्यों नहीं है?"

धन्य धान्य पुष्प भरी वसुंधरा ये हमारी (गीत)

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 धन्य धान्य पुष्प भरी वसुंधरा ये हमारी। धन्य धान्य पुष्प भरी वसुंधरा ये हमारी इसमें है ये देश हमारा सब देशों में न्यारा, इसे सपनों से सजाया हमने स्मृतियों से है घेरा  ऐसा देश जहां पे ढूंढे पायेगा न कोई सब देशों की रानी है ये हमारी जन्म भूमि....... ये प्यारी जन्म भूमि, ये हमारी जन्म भूमि...... ऐसी प्यारी नदियां कहाँ , कहाँ ऐसे धूम्र पहाड़ कहाँ खेत हरियाली ऐसी धरती चूमे आकाश, यहां हर भरे खेतों पे डोले पुरवैया हौले हौले। ऐसा देश जहां पे ढूंढे पायेगा न कोई सब देशों की रानी है ये हमारी जन्म भूमि....... ये प्यारी जन्म भूमि, ये हमारी जन्म भूमि...... माँ भाई का प्यार है ऐसा , कहाँ मिलेगा जग में ऐसा  माँ तुम्हारे चरणों को मैं सीने से लगा लूँ, इस देश मे मैन जन्म लिया माँ अंतिम सांस यहां लूँ। ऐसा देश जहां पे ढूंढे पायेगा न कोई सब देशों की रानी है ये हमारी जन्म भूमि....... ये प्यारी जन्म भूमि, ये हमारी जन्म भूमि......      यह गीत धन्य धन्य पुष्पे भरा बंगाली गीत का हिंदी रूपांतरित गीत है जो कि गाने में बहुत ही उत्तम प्रकृति का है।           ...

लड़ लो -झगड़ लो मगर बोलचाल बंद मत करो

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सदा याद रखना, भले ही लड़ लेना-झगड़ लेना, पिट जाना-पीट देना, मगर बोलचाल बंद मत करना, क्योंकि बोलचाल के बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते है। गुस्सा बुरा नहीं है। यह मानव स्वभाव है लेकिन गुस्से के बाद आदमी जो बैर पाल लेता है, वह बुरा है। पालते गुस्सा तो बच्चे भी करते है, मगर बैर नहीं वे इधर झगड़ते हैं और उधर अगले ही क्षण फिर एक हो जाते हैं। कितना अच्छा रहे कि हर कोई बच्चा ही रहे। कुछ व्यक्ति ऐसे होते है जो गलती से प्रेरणा लेकर उससे लाभ उठाते हुए आगे के लिए सावधान हो जाते है और कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिन्हें कभी अपनी गलती का अहसास ही नहीं होता और वे जिन्दगी भर ठोकरें खाते रहते है। क्षमापना का दिन साल भर का हिसाब किताब पूरा कर लेना है। कल से नया खाता खुलेगा, नए बहीखाते होंगे, पर इस नए बहीखाते में पुराने बहीखाते की बैलेंस शीट नहीं होगी। सालभर में व्यक्ति ने जो भी बैर-विरोध किया हो, उसके लिए क्षमा याचना करता है और मिच्छामि-दुक्कड़म्' बोलता है।

क्षमा बड़न को चाहिए

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क्षमा बड़ी चीज है। बतौर उदाहरण एक बार संख्या 9 ने संख्या 8 को थप्पड़ मार दिया। 8 रोने लगा और पूछा, मुझे थप्पड़ क्यों मारा ? तो 9 ने कहा, क्यों मारा ? मैं बड़ा हूँ। इसलिए तुम्हें मार सकता हूँ। यह मेरा अधिकार है। यह सुनते ही 8 ने 7 को थप्पड़ मार दिया और 9 वाली बात दोहरा दी। फिर क्या था ? फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा। सात ने 6 को मारा 6 ने 5 को मारा 5 ने 4 को मारा 4 ने 3 को मारा 3 ने 2 को मारा, 2 ने एक को मारा। अब एक किसको मारे ? एक ने अपने नीचे 0 (शून्य) को देखा तो उसकी हालत तो थप्पड़ पड़ने से पहले ही पतली हो रही थी। एक ने उसे मारा नहीं, बल्कि उसे प्यार से उठाकर अपने बगल में बैठा लिया और ज्यों ही शून्य की बगल में बैठाया एक की ताकत 10 गुना बढ़ गई। अब तो 9 की हालत देखने लायक थी लेकिन 10 ने उसे मारा नहीं, अपितु उसे माफ कर दिया और उसको भी अपने बगल में बैठा लिया । 9 के बगल में बैठते ही एक का कद 109 हो गया। माफ करने वाला, क्षमा करने वाला हमेशा बड़ा ही होता है।

दया यज्ञ

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 एक गृहस्थ ने तीन यज्ञ किये जिनमें उसका सब धन खर्च हो गया। गरीबी से छूटने के लिए एक विद्वान् ने बताया कि तुम अपना यज्ञों का पुण्य अमुक सेठ को बेच दो, वह तुम्हें धन दे देंगे। वह व्यक्ति पुण्य बेचने चल दिया। रास्ते में एक जगह भोजन करने बैठा तो एक भूखी कुतिया वहाँ। बैठी मिली, जो बीमार भी थी चल फिर भी नहीं सकती थी। उसकी दशा देख कर गृहस्थ को दया और उसने अपनी रोटी कुतिया को खिला दी और खुद भूखा ही आगे चल दिया।  धर्मराज के यहाँ पहुँचा तो उनने कहा- तुम्हारे चार यज्ञ जमा है। जिसका पुण्य बेचना चाहते हो? गृहस्थ ने कहा- मैंने तो तीन ही यज्ञ किये थे, यह चौथा यज्ञ कैसा? धर्मराज ने कहा- यह दया-यज्ञ है। इसका पुण्य उन तीनों से बढ़कर है । गृहस्थ ने एक यज्ञ का पुण्य बेचा। उसमें जो धन मिला उससे दया- यज्ञ करने लगा। पीड़ितों की सहायता ही उसका प्रधान लक्ष बन गया। इसके पुण्य फल से उसने अपने लोक-परलोक दोनों सुधारे। दया और उदारता से प्रेरित होकर किया हुआ परोपकार साधारण धर्म प्रक्रियाओं की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है ।

भविष्य की तैयारी

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 एक राज्य का यह नियम आज्ञा कि जो राजा गद्दी पर बैठे उसे दस वर्ष बाद ऐसे निविड़ वन में छोड़ दिया जाय जहाँ अन्न-जल उपलब्ध न हो और वहाँ वह भूखा प्यासा तड़प-तड़प कर मर जाए कितने ही राजा इसी प्रकार अपने प्राण गँवा चुके थे और राज्य के दिनों में भी भविष्य की चिन्ता से दुखी रहते थे। एक बार एक बुद्धिमान राजा गद्दी पर बैठा। उसे भविष्य का ध्यान था। उसने उस निविड़ वन को देख और वहाँ खेती कराने, जलाशय बनाने, पेड़ लगाने तथा प्रजा बसाने का कार्य आरंभ कर दिया। दस वर्ष में वह भयावना प्रदेश अत्यंत रमणीक और आनन्द दायक बन गया। राजा अपनी अवधि समाप्त होते ही वहाँ गया और शेष जीवन सुख पूर्वक व्यतीत किया। जीवन कुछ दिन का राज है, इसके बाद चौरासी लाख योनियों का कुचक्र फिर तैयार है। जो इस नर तन को पाकर सुकर्मों द्वारा अपना परलोक बना लेते हैं वे ही इस बुद्धिमान राजा की तरह दूरदर्शी होते हैं।

चार मूर्ख

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 एक गाँव में एक प्रसिद्ध संत का आगमन हुआ। उसी गाँव में चार मूर्ख मित्र भी निवास करते थे। संत का स्वागत-सत्कार देख, उन्हें बड़ी उत्सुकता हुई, पूछा तो पता चला कि संत ने मौन रहकर गहन तपस्या की है और बहुत सी सिद्धियों के स्वामी भी हैं। बस, फिर क्या था, मूर्खों ने सोचा कि सम्मान प्राप्त करने का सबसे सुगम उपाय यही है। चारों ने एक दीया लिया और जंगल में एक अँधेरी गुफा ढूँढ़कर उसमें जा बैठे। निर्णय किया कि मौन रहेंगे तो देखा-देखी सिद्धियाँ हमारे पास दौड़ी चली आएँगी, फिर सम्मान मिलने में क्या देरी है। थोड़ा वक्त ही गुजरा था कि दीये की लौ लपलपाने लगी। उनमें से एक बोला— “अरे कोई दीये में तेल तो डालो।" दूसरा तुरंत बोला – "बेवकूफ! बातें थोड़ी करनी थीं।" तीसरा कहने लगा- "तुम दोनों मंदबुद्धि हो । मेरी तरह चुप नहीं बैठ सकते ?" चौथा भी कहाँ शांत रहने वाला था, वह बोला –"सबके सब बोल रहे हो, सिर्फ मैं हूँ कि चुप बैठा हूँ।" मूढ़ ऐसे ही अनर्थ के प्रपंचों में समय गँवाते हैं; जबकि बुद्धिमान विवेक का उपयोग कर, जीवन को समर्थ व सुदृढ़ बनाते हैं ।

महाराणा प्रताप की जननी

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 महाराणा प्रताप को सब जानते हैं, पर उनकी जननी कौन थी, कहाँ से आई थी, यह जानकारी विरलों को ही है। पिता महाराणा उदयसिंह अरावली की दुर्गम घाटियों में भटक रहे थे । उन्होंने देखा कि एक किसान कन्या सिर पर बड़ी टोकरी लिए आ रही है। उसमें रोटी, दाल, खेती के औजार आदि थे। दूसरे हाथ से सात-आठ बछड़े एक ही रस्सी से पकड़े थी। चेहरे पर अनूठा तेज था। उसने पास आकर महाराणा को इस स्थिति में देखा तो साथ चलने को कहा। पहाड़ियों के बीच उसका घर था। किसान ने अपनी पुत्री के साथ आए राजा को पहचान लिया। पानी पिलाया, रोटी खिलाई। तब तक महाराणा, जो अब तक अविवाहित थे, किसान से उनकी पुत्री माँग चुके थे। देख चुके थे कि वह सिंहनी के समान है। उसकी कोख से सिंह ही पैदा होगा। किसान को जब बताया गया तो उसने कहा – “मेरी क्या हैसियत – आप कहाँ, हम कहाँ!" पर - - महाराणा ने उसे समझा कर विवाह कर लिया। रानी जैसी सुयोग्य सहायक व ऊर्जा की स्रोत पाकर दूने उत्साह से उन्होंने अरावली पर्वतश्रेणियों के बीच उदयपुर नगर की नींव डाली और राज्य को सुव्यवस्थित किया। इस रानी की कोख से ही नररत्न महाराणा प्रताप जन्मे थे। रानी ने बड़े मन से उन्हें...

एकता

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 एक बार किसी क्षेत्र में भयंकर सूखा पड़ा। एक परिवार के सदस्यों ने किसी अन्य क्षेत्र में जाने के लिए आवश्यक सामान बाँधा और निकल पड़े। मार्ग में वे पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिए रुके। परिवार के मुखिया ने अपने तीन लड़कों को तीन विभिन्न कार्यों के लिए भेजा। एक पानी, दूसरा ईंधन और तीसरा अग्नि लेकर लौटा। तत्काल चूल्हा जलाया गया। पकाने हेतु पेड़ पर चढ़कर जो भी मिल जाए, वह लाने का निर्णय किया गया। उनकी गतिविधि को पेड़ पर चढ़ा एक देव देख रहा था। उसने उनकी एकता को देखकर उनसे कहा – “इस पेड़ की जड़ में अशरफियों का घड़ा गड़ा है, उसे ले लो और सुख से रहो।" परिवार ने देव की आज्ञा का पालन किया और सुखपूर्वक घर लौट गए। उनके पड़ोसियों को घटना का पता चला तो उन्होंने भी ऐसा ही नाटक करने का प्रयत्न किया, परंतु उनके तीनों लड़के अपने-अपने कार्यों को करने के स्थान पर आपस में ही लड़ने लग गए। देव का आशीर्वाद पाने के स्थान पर वे उसके कोप के भागी बने और जो था, उसे भी गँवा बैठे। एकता ही सफलता का सूत्र है ।

अहंकार

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 राजा जनक ने शास्त्रों में पढ़ा कि घोड़े की रकाब में एक पाँव रखने से लेकर दूसरा पाँव रखने में जितना समय लगता है, आत्मज्ञान उतने ही समय में संभव है। राजा जनक में आत्मज्ञान प्राप्त करने की उत्कट अभिलाषा थी, सो उन्होंने राज्य के समस्त ज्ञानीजनों को बुलाया और उनसे कहा- "यदि यह शास्त्रवचन सत्य है तो मुझे भी आत्मज्ञान की अनुभूति ऐसे ही करवाइए।" राजा का अनुरोध सुनकर पंडितजन घबराए और बोले – “राजन्! हमने तो आत्मज्ञान के विषय में पढ़ा मात्र है, उसकी अनुभूति कैसे हो या कैसे कराई जाए- इसके विषय में हम कुछ नहीं जानते।" उनकी अनभिज्ञता को जानकर राजा जनक को क्रोध आया और उन्होंने सभी को कारावास में डालने का आदेश दिया। राज्य के समस्त पंडितों के कारावास में डाले जाने का समाचार सुनकर महर्षि अष्टावक्र, राजा जनक के पास पहुँचे और उनसे कहा- “राजन् ! इन विद्वानों को मुक्त कर दो, शास्त्रवचन को सत्य मैं सिद्ध करूँगा।" इसके उपरांत अष्टावक्र, जनक को घोड़े पर लेकर नगर से दूर चले। एकांत में पहुँचने पर उन्होंने जनक से अपना एक पाँव घोड़े की एक रकाब में रखने को कहा। उनके पैर रखते ही अष्टावक्र ने राज...

अवसर का सदुपयोग

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 एक महात्मा जी ने एक निर्धन व्यक्ति की सेवा से प्रसन्न होकर उसे एक पारस पत्थर दिया और बोले - "इससे चाहे जितना लोहा, सोना बना लेना । मैं सप्ताह भर बाद लौटकर इसे वापस ले लूँगा।" वह व्यक्ति बहुत खुश हुआ। उसने बाजार जाकर लोहे का भाव पूछा तो पता चला कि लोहा सौ रुपये कुंतल बिक रहा है। उस व्यक्ति ने पूछा कि क्या भविष्य में लोहा सस्ता होने की उम्मीद है तो दुकानदार ने उत्तर 'हाँ' में दिया । यह सुनकर वह व्यक्ति यह सोचकर घर लौट आया कि लोहा सस्ता होने पर खरीदूँगा। दो दिन छोड़कर वह फिर बाजार गया, लेकिन लोहा अभी भी उस भाव पर बिक रहा था । वह फिर घर लौट आया। सप्ताह पूरा होने से पहले उसने यह भाग- -दौड़ दो-तीन बार की, परंतु बिना लोहा खरीदे ही समय गुजार दिया। महात्मा जी लौटे तो उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति यथावत् देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। पूछने पर उन्हें सारा विवरण ज्ञात हुआ तो वे बोले- "अरे मूर्ख! लोहा चाहे कितना भी महँगा होता, परंतु सोने से तो कई गुना सस्ता होता । यदि तू प्रतिदिन कुंतल भर लोहा भी सोने में बदल रहा होता तो आज सात कुंतल सोने का मालिक होता, परंतु अपने अविवेक के कार...

तेप्सुगन दोको कनाई युग के प्रसिद्ध झेन संत

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तेप्सुगन दोको कनाई युग के प्रसिद्ध झेन संत हुए हैं। तेरह वर्ष की छोटी आयु में हीउ न्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली और जन-जन तक भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को पहुँचाने का बीड़ा उठाया। शीघ्र ही उन्हें यह ज्ञान हो गया कि समाज के हर वर्ग तक बौद्ध धर्म को पहुँचाने हेतु धर्मसूत्रों का प्रकाशन स्थानीय भाषा में करना होगा। तेत्सुगन ने प्रण किया कि वे जापान के हर गाँव, हर नगर में भिक्षाटन कर अपने संकल्प की पूर्ति के लिए जरूरी धन का उपार्जन करेंगे। दस वर्षों के अबाध परिश्रम के बाद इस महती कार्य के आवश्यकतानुसार पूँजी एकत्र हो पाई। ग्रंथ का प्रकाशन अभी आरंभ हुआ ही था कि ऊजी नदी में भयंकर बाढ़ आ गई और हजारों बेघर हो गए। दया वा प्रेम की मूर्ति, संत तेप्सुगन ने समय गँवाए बिना सारा धन जरूरतमंदों में बाँट दिया और पुनः देशाटन पर निकल पड़े। कई वर्षों के प्रयास और धनसंग्रह के उपरांत प्रकाशन प्रारंभ हुआ, किंतु उसी वर्ष जापान को महामारी ने आ घेरा सहयोगियों के घनघोर विरोध के बावजूद तेप्सुगन ने एकत्रित धन पुनः पीड़ितों में बाँट दिया । कहते हैं कि उसके पश्चात उन्हें बीस वर्ष और लगे पर अंततः अपना शरीर छोड़...

छठ पूजा- आस्था का महापर्व

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  उगते हुए  सूर्य को सब प्रणाम करतें है, अस्त होते हुए सूर्य को कौन पूजता है! परंतु पूर्वांचल संस्कृति में अस्त होते हुए सूर्य की भी पूजा होती है, ऐसा माना जाता है कि सूर्य भगवान ही एक मात्र ऐसे भगवान है जिनके हम सजीव दर्शन कर सकतें है, और जिनके कारण हम सब जीवित है , हम सबका अस्तित्व है और हम सबको यह चाहिए कि हम सब उनके प्रति कृतज्ञ रहें। छठ पूजा इसी कृतज्ञता को व्यक्त करने का माध्यम है। छठ पूजा का आरंभ   एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे , तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी । तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था । इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान , जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी । कहा जाता हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी...