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आपकी मूर्ति कहाँ है

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                      आपकी मूर्ति कहाँ है सिकन्दर की राजधानी में एक सुन्दर बगीचा था। उसमें प्राचीन और  विद्यमान पराक्रमी पुरुषों की मूर्तियाँ खड़ी की गयी थीं। एक बार सिकन्दर की राजधानी देखने के लिए कोई बड़ी विदेशी आया। वह सिकन्दर का ही मेहमान था, अतः उसे शाही अतिथि गृह में ठहराया गया। सिकन्दर उसे अपना शाही बगीचा दिखाने के लिए अपने साथ ले गया। वहाँ रखी हुई मूर्तियों के बारे में मेहमान के पूछने पर कि यह किसकी मूर्ति है, सिकन्दर उसके बारे में उचित जानकारी देता। सारी मूर्तियाँ देखने के बाद मेहमान ने पूछा, “महाराज, आपकी मूर्ति कहीं भी दिखाई नहीं दी सिकन्दर ने जवाब दिया, “मेरी मूर्ति यहाँ रखी जाय और फिर अगली पीढ़ी यह प्रश्न करे कि यह मूर्ति किसकी है, इसकी अपेक्षा से बेहतर यह अधिक अच्छा लगेगा कि मेरी  मूर्ति ही न रखी जाय और लोग पूछे कि सिकन्दर की मूर्ति क्यों नहीं है?"

लड़ लो -झगड़ लो मगर बोलचाल बंद मत करो

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सदा याद रखना, भले ही लड़ लेना-झगड़ लेना, पिट जाना-पीट देना, मगर बोलचाल बंद मत करना, क्योंकि बोलचाल के बंद होते ही सुलह के सारे दरवाजे बंद हो जाते है। गुस्सा बुरा नहीं है। यह मानव स्वभाव है लेकिन गुस्से के बाद आदमी जो बैर पाल लेता है, वह बुरा है। पालते गुस्सा तो बच्चे भी करते है, मगर बैर नहीं वे इधर झगड़ते हैं और उधर अगले ही क्षण फिर एक हो जाते हैं। कितना अच्छा रहे कि हर कोई बच्चा ही रहे। कुछ व्यक्ति ऐसे होते है जो गलती से प्रेरणा लेकर उससे लाभ उठाते हुए आगे के लिए सावधान हो जाते है और कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जिन्हें कभी अपनी गलती का अहसास ही नहीं होता और वे जिन्दगी भर ठोकरें खाते रहते है। क्षमापना का दिन साल भर का हिसाब किताब पूरा कर लेना है। कल से नया खाता खुलेगा, नए बहीखाते होंगे, पर इस नए बहीखाते में पुराने बहीखाते की बैलेंस शीट नहीं होगी। सालभर में व्यक्ति ने जो भी बैर-विरोध किया हो, उसके लिए क्षमा याचना करता है और मिच्छामि-दुक्कड़म्' बोलता है।

छठ पूजा- आस्था का महापर्व

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  उगते हुए  सूर्य को सब प्रणाम करतें है, अस्त होते हुए सूर्य को कौन पूजता है! परंतु पूर्वांचल संस्कृति में अस्त होते हुए सूर्य की भी पूजा होती है, ऐसा माना जाता है कि सूर्य भगवान ही एक मात्र ऐसे भगवान है जिनके हम सजीव दर्शन कर सकतें है, और जिनके कारण हम सब जीवित है , हम सबका अस्तित्व है और हम सबको यह चाहिए कि हम सब उनके प्रति कृतज्ञ रहें। छठ पूजा इसी कृतज्ञता को व्यक्त करने का माध्यम है। छठ पूजा का आरंभ   एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे , तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी । तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था । इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान , जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी । कहा जाता हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी...