ममता (कहानी+कविता)







एक वृद्धा का एक पुत्र था। किसी कारण से उसके पुत्र ने उसे बहुत मारा। वह बुरी तरह घायल हो गयी, उसे कई गंभीर चोटें आयी। पड़ोस के कुछ व्यक्ति आये और उसे लेकर अस्पताल भर्ती करवाए। अस्पताल में एक व्यक्ति उस वृद्धा को बड़े ध्यान से देख रहा था। यह सब क्या हो रहा था? उसके समझ में नही आ रहा था, उसके कारण का अंदाजा भी नही लगा पा रहा था। उससे रहा न गया वह पास में गया और लोगों से इसं सब का कारण पूछा, तो पाया कि उसी के पुत्र ने उसे बेरहमी से मारा था। वह ऐसी घटना सुन कर बहुत ही व्यथित हो गया। भावुक हो कर उसके मुख से निकला, ‘ईश्वर करे ऐसा पुत्र जन्म ही न ले इस संसार में, यदि ऐसा पुत्र जन्मा ही नही होता, तो आज ऐसे दिन देखने को नही मिलते’। उस वृद्धा ने धीरे धीरे शब्दों में कहा, ‘कृपया ऐसा मत कहें, वह अभी नादान है, उसे कुछ भी नही पता, जब वह बड़ा हो जायेगा तो सब समझ जायेगा। वह व्यक्ति इतना सुन कर आश्चर्य चकित रह गया। इतनी पीड़ा के बाद भी उस माँ का दिल सागर ही रहा। उस व्यक्ति ने ईश्वर से यही प्रार्थना की, ‘कि ऐसी माँ सबा को मिले’।
     दोस्तों , कहा भी गया है- “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि”। जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है। माँ की ममता सागर से भी गहरी होती है। पुत्र चाहे जितना भी बुरा क्यों न हो, माँ सदैव उसकी गलतियों को माफ कर देती है। अंततः माँ के ममता की हमेशा जीत हुई है और पुत्र के हठ की हार।
     दोस्तों, माँ को समर्पित एक मेरा छोटा सा प्रयास, आइये हम सभी माँ को अपने मन के भाव आज कह दें-
       माँ
“इन आँखों की झुर्रियों ने,
बहुत ही समय झेली है।
पाल पोस कर बड़ा किया,
अपनी भी दुःख भूली है।
मुझ से बनी ये झुर्रियां ,
जीवन का एक सार बनी।
कृतियों का हर्ष तार बनी,
घर का एक द्वार बनी।
क्षमाँ प्रार्थी हूँ माँ आपका,
चहिये साथ आज भी आपका।
माँ तुम ही ईश्वर हो,
मेरे जीवन का परमेश्वर हो।
तुम करुणा की खान हो,
मेरे जीवन का मान हो।
तुम सागर ,निर्मल सरिता तुम ही,
जैसी चाह तुम बनी वैसी।
शब्द नही है अब मेरे पास,
तुम ही त्योहारो का उल्लास।”

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