Monday, 16 January 2017

सभी बाधाओं का हल (कहानी)

 एक आदमी काफी दिनों से परेशान चल
रहा था जिसके कारण वह काफी दिनों से चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहा करता था। वह इस बात से हमेशा परेशान रहता था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के कन्धों पर टिकी है, हमेशा  उसके यहाँ किसी न किसी मेहमान का आना जाना लगा ही रहता था, और उसे बहुत ज्यादा आय कर भी देना पड़ता था, इसके अलावा उसे कई परेशानियां सताती रहती थी।


 इन्ही सब बातों को सोच सोच कर वह ज़्यादातर  परेशान रहा करता था और बच्चों को अक्सर डांट देता , अपनी पत्नी से भी अधिकतर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता ही रहता था।



 एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और कहा पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करवा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनावग्रस्त था, तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया। लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा ठंडा हुआ तो, वह बेटे के पास गया और देखा कि उसका बेटा सोया गया और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी रखी थी, उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के शीर्षक पर पड़ी।



होमवर्क का शीर्षक था- वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगती, लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं। 
 इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ का लेख लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था-



#  मैं अपने पहले हुए  एग्जाम को बहुत बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं।



# मैं बेहद ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाओं को बहुत धन्यवाद देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं।



#  मैं सुबह उस जगाने वाली उस अलार्म  को बहुत बहुत धन्यवाद देता हूँ जो कि मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ।



# मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं।



#  बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग हुआ लग रहा हो। उसकी सोच ही बदल गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी।खासकर वह अंतिम वाली लाइन। उसकी नींद ही उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में बैठ कर चिन्तन मनन करना शुरू कर दिया।



#  मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका अर्थ है कि मेरे पास बड़ा घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास तो घर भी नहीं है।


# मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा छोटा सा प्यारा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो इस दुनिया में अकेले हैं।


मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक पद प्रतिष्ठा है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले कई अच्छे लोग हैं।



# मैं बहुत ज्यादा आयकर भरता हूँ, इसका अर्थ है कि मेरे पास अच्छी नौकरी है और मैं उन लोगों से बेहतर हूँ जो बेरोजगार हैं, पैसों की वजह से बहुत सी चीजों और सुविधओं की कमी है।



# हे! ईश्वर ! तेरी ही कृपा है , मुझे क्षमा करना, मैं तेरे दिए वरदान को पहचान नहीं पाया।


# उसके बाद से उसकी सोच एकदम से बदल ही गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म ही हो गयी। वह अब बदला बदला सा लगने लगा। वह भागता हुआ अपने बेटे के पास गया और सोये हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने पुत्र और ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।



# दोस्तों , हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे हुए महसूस करेंगे। लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखना शुरूनकर देंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हम चीज़ों को सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचना शुरूकर देंगे , हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए - नए रास्ते ख़ुद ही दिखाई देने लगेंगे।


Friday, 13 January 2017

दीपावली का उपहार (कहानी)

दीपावली का उपहार

एक डाकिये ने एक घर के दरवाजे पर
आ कर कहा,"चिट्ठी ले लीजिये।" अंदर से एक लड़की की आवाज आई - "आ रही हूँ।" लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई  भी अंदर से नहीं आया तो डाकिये ने फिर से कहा-"अरे भाई! इस घर में कोई है कि नहीं, अपनी चिट्ठी ले जाओ।

 लड़की की फिर अंदर से आवाज आई-"भईया, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए, मैं आ रही हूँ। डाकिये ने कहा-"नहीं, मैं खड़ा हूँ, तुम्हारी पंजीकृत (रजिस्टर्ड) पत्र है, इस पर तुम्हारे साइन चाहिये।" 

लगभग छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। डाकिया इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर अब वह चिल्लाने वाला था ही था कि दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज लड़की जिसके पांव नहीं थे, उसके सामने खड़ी थी। 

  डाकिया चुपचाप उसको पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। सप्ताह, दो सप्ताह में जब कभी उस लड़की के लिए कोई  डाक आती तो डाकिया एक आवाज देता और जब तक वह लड़की न आती तब तक  वह बाहर ही खड़ा रहता। 

एक दिन उस लड़की ने डाकिये को नंगे पैर खड़ा देखा। इससे पहले उसने कभी डाकिये के पैरों पर ध्यान नहीं दिया था। दीवाली का त्यौहार भी नजदीक आ रही थी। उसने सोचा डाकिये को क्या उपहार दूँ।

एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। 

डाकिये ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई- "कौन? "डाकिया, उत्तर मिला। लड़की हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा-"अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है। "डाकिये ने कहा- "तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो, तुमसे मैं उपहार कैसे ले सकता हूँ?" लड़की ने आग्रह किया कि मेरी इस उपहार  के लिए मना नहीं करें। "ठीक है! कहते हुए पोस्टमैन ने वह पैकेट ले लिया।

लड़की ने कहा,"अंकल इस पैकेट को कृपया घर ले जाकर ही खोलियेगा। घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो अचंभित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। उसकी आँखें भर गयीं।

 अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से प्रार्थना की कि उसका तबादला तुरन्त कर दिया जाए।पोस्टमास्टर ने कारण पूछा, तो पोस्टमैन ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुके कंठ से कहा-"आज के बाद से मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा सर?"

दोस्तों  संवेदनशीलता का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदार बनना, उसमें शामिल होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अपने आप में अधूरा है।

 ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह हम सभी को संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम सभी एक दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। ताकि संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है, अपितु उसे एहसास हो कि सारी मानवता उसके साथ खड़ी है।

Tuesday, 10 January 2017

एक वेश्या के माध्यम से हुआ विवेकानंद को संन्यासी होने का अनुभव

एक वेश्या के माध्यम से हुआ विवेकानंद को संन्यासी होने का अनुभव


दोस्तों 12 जनवरी को युवा दिवस है , और
हम सभी इसे स्वामी विवेकानंद के सम्मान में हर वर्ष इसी दिन युवा दिवस के रूप में मनातें है। लेकिन क्या आप जानतें है एक वेश्या के माध्यम से हुआ था विवेकानंद को संन्यासी होने का अनुभव। आइये पढतें है स्वामी जी का ही ऐसा ही एक संस्मरण।

स्वामी विवेकानंद जी ने शिकागो के कोलंबस हाल में चल रहे धर्मसंसद में भाषण देकर पूरे विश्व को ये एहसास कराया कि भारत विश्व गुरु था और है। 

अमेरिका प्रस्थान से पहले स्वामी विवेकानंद जी जयपुर के  महाराजा के महल में ठहरे थे। राजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का परम भक्त था। स्वामी विवेकानंद जी के स्वागत के लिए राजा ने एक भव्य आयोजन किया। इसमें वेश्याओं को भी आमंत्रित किया गया था।राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के माध्यम से एक संन्यासी का स्वागत करना उचित नहीं है। विवेकानंद उस समय थोड़े अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरी तरह  से संन्‍यासी नहीं बने थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो अपना कमरा बंद कर लिया। जब राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से क्षमा मांगी।

जयपुर के राजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसके पैसे दे दिए हैं, लेकिन ये देश की सबसे बड़ी वेश्या है, अगर इसे ऐसे चले जाने को कहेंगे तो उसका अपमान होगा। आप कृपा करके बाहर आएं। 

स्वामी विवेकानंद कमरे से बाहर आने में डर रहे थे। उसी समय वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ कुछ इस प्रकार था- 

''मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे किसी भी योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल ही सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम?''

स्वामी विवेकानंद जी ने अपने कमरे से इस गीत को सुना, वेश्‍या ऐसा रोते हुए गा रही थी। उन्होंने उसकी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। 

स्वामी विवेकानंद जी से रहा नहीं गया और उन्होंने कमरे का गेट खोल दिया। स्वामी विवेकानंद जी मानों ऐसा लग रहा था कि वो एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आकर बैठ गए। 

उस रात उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, ''ईश्‍वर से एक नया प्रकाश मिला है मुझे। डरा हुआ था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी मेरे भीतर। इसीलिए डर गया मैं। किंतु उस औरत ने मेरी आत्मा को पूरी तरह झकझोर दिया। मैंने पहले कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा।'

शिक्षा- इस घटना से स्वामी विवेकानंद जी को तटस्थ रहने का ज्ञान मिला, आपका मन दुर्बल और निसहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण पहले से कभी तय मत रखो।



Monday, 9 January 2017

अध्यापक की सीख (कहानी)

अध्यापक की सीख (कहानी)


एक स्कूल का छात्र था जिसका नाम था
प्रकाश। वह बहुत चुपचाप सा और अकेले अकेले  रहता था। किसी से ज्यादा बात भी नहीं करता था, इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा दिखता रहता था। पर लोग उस पर कभी ध्यान नहीं देते थे।

  एक दिन वह अपने क्लास रूम में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक  उसके पास आये और क्लास के बाद मिलकर जाने को कहा। क्लास खत्म होते ही प्रकाश अध्यापक  के कमरे में पहुंचा गया। 


  प्रकाश मैं देखता हूँ कि तुम ज़्यादातर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी में रूचि दिखाते हो! 

इसका क्या कारण है ? अध्यापक  ने प्रकाश से प्रश्न किया।

  प्रकाश बोला, मेरा बीता हुआ समय बहुत ही खराब रहा है, मेरे जीवन में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं घटित हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ।

  अध्यापक  ने ध्यान से प्रकाश की बातें ध्यान से सुनी और उसे रविवार को अपने घर पर बुलाया। प्रकाश अपने नियत समय पर अध्यापक  के घर पहुँच गया।

 प्रकाश क्या तुम शिकंजी पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने प्रकाश से पूछा। 

जी।  प्रकाश ने कहा।

  अध्यापक  ने शिकंजी बनाते समय जानबूझ कर नमक की मात्रा अधिक डाल दी और चीनी की मात्रा  कम रखी।  

शिकंजी का एक घूँट पीते ही प्रकाश ने अजीब सा मुंह बना लिया।

 अध्यापक  ने पुछा,  प्रकाश क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

 जी,  इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है मुझे ऐसा लगता है।

 प्रकाश अपनी बात कह ही रहा था की अध्यापक  ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा-ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किस काम की !

ऐसा कह कर अध्यापक  गिलास उठा ही रहे थे कि प्रकाश ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या हुआ, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

  बिलकुल ठीक प्रकाश यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था। अब इस स्थिति की तुम अपनी जीवन से तुलना करो, शिकंजी में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह ही है।

और अब इस बात को समझो, "शिकंजी का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे से नमक तो नहीं निकाल सकते,

 इसी प्रकार हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को अपने जीवन से अलग भी नहीं कर पाते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शिकंजी का स्वाद ठीक कर लेते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

  यदि तुम अपने बीते हुए जीवन का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान ही सही होगा और ना ही भविष्य उज्जवल  और प्रकाशमय हो पायेगा। अध्यापक  ने ऐसा कहते हुए अपनी बात पूरी की।"

 प्रकाश को वास्तव में अनुभव हुआ कि मैंने अपने जीवन में अधिकतर समय गड़े मुर्दे निकलने का काम था, उसने मन ही मन प्राण किया कि अब वो ऐसी बातों को कभी नहीं याद करेगा जो उसे दुःख देती है, और हमेशा अपने अध्ययन कार्य में व्यस्त रहेगा, और अपने जीवन में मिठास घोलने की कोशिश करता रहेगा।

Sunday, 8 January 2017

जीवन को सकारात्मक बनाने की कला (कहानी)

 जीवन को सकारात्मक बनाने की कला (कहानी)

एक स्थान पर बड़ी सी इमारत का निर्माण
कार्य चल रहा था, और वहाँ काफी दिन से इमारत का काम चल रहा था। उस जगह रोज़ रोज़ सभी मजदुरों के छोटे छोटे बच्चे एक दुसरों की शर्ट पकडकर रेल-रेल का खेल खेला  करते थे।

उन बच्चों में रोज कोई इंजिन बनता था और बाकी बच्चे इंजिन के डिब्बे बनते थे।

इंजिन और डिब्बे वाले बच्चे प्रायः रोज बदल जाते थे, लेकिन केवल चङ्ङी पहना एक छोटा बच्चा हाथ में  रखे हरे रंग का रखा कपड़ा घुमाते हुए गार्ड बनता था।

उनको रोज़ रोज़ देखने वाले एक व्यक्ति ने कौतुहल से  हमेशा गार्ड बनने वाले बच्चे को बुलाकर पूछा, "बच्चे, तुम रोज़ गार्ड बन जाते हो। तुम्हें कभी इंजिन, कभी डिब्बा बनने की इच्छा नहीं होती क्या?"

इस पर वह छोटा सा बच्चा बोला...

 "बाबूजी, मेरे पास पहनने के लिए कोई भी शर्ट नहीं है। तो मेरे पिछले वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे? और मेरे पीछे कौन खड़ा रहेगा?

इसलिये मैं रोज गार्ड बनकर खेल में हिस्सा लेता हूँ।

 "ये बोलते समय उसके आँखों में पानी दिखाई दिया।

आज वो बच्चा जीवन में सभी को एक बहुत बड़ी शिक्षा दे गया।

किसी का जीवन कभी भी परिपूर्ण नहीं होता। उसमें कोई न कोई कमी जरुर रहेगी।

 वो एक छोटा सा बच्चा माँ-बाप से नाराज़ होकर रोते हुए बैठ सकता था। वैसे न करते हुए उसने परिस्थितियों का समाधान ढूंढा और अपने जीवन को उसने सकारात्मक ढंग से देखा।

 हम लोग अपने जीवन में कितना रोते है!
 कभी अपने साँवले से रंग के लिए, कभी छोटे से क़द के लिए, कभी पडोसी की कार, कभी पड़ोसन के गले का हार, कभी अपने परीक्षा में मिले काम नंबर, कभी अंग्रेज़ी, कभी पर्सनालिटी, कभी नौकरी की मार तो कभी काम धंधे में मार... हमें इससे बाहर आना पड़ता है।

🔴  ये जीवन है... अपने जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण दे कर देखिये, अपने परेशानियों को अपना शिक्षक मान कर देखिये, ज़रूर आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों सकारात्मक हो जायेगी।

Saturday, 7 January 2017

बेटे की ईमानदारी

 बेटे की ईमानदारी


रामू अपने गाँव के सबसे बड़े चोरों में से
एक चोर था। रामू रोजाना जेब में छूरा डालकर रात को लोगों के घर में चोरी किया करता था। पेशे से चोर था, लेकिन हर व्यक्ति चाहता है कि उसका पुत्र अच्छे स्कूल में पढाई करे। तो यही सोचकर बेटे का दाखिला एक अच्छे स्कूल में करवा दिया।

रामू का बेटा पढाई में बहुत होशियार और तेज़ था, लेकिन धन के अभाव में बारहवीं के बाद नहीं पढ़ पाया।  कई जगह नौकरी के लिए भी चक्कर लगाया, लेकिन कोई उसे उसके पिता जी के बदनामी के कारण नौकरी पर नहीं रखता था।

 एक तो चोर का बेटा ऊपर से केवल बारहवीं पास इसलिए कोई नौकरी पर नहीं रखता था। अब वह बेचारा बेरोजगार की तरह ही दिन रात घर पर ही खाली बैठा रहता। रामू को अपने बेटे की चिंता सताने लगी तो सोचा कि क्यों ना इसे भी अपना काम ही सिखाया दिया जाये। जैसे मैंने चोरी करके अपना पेट पाला है, उसी तरह ये भी गुजर बसर कर लेगा।

 यही सोचकर रामू एक दिन अपने बेटे को अपने साथ लेकर गया। रात्रि का समय था दोनों चुपके से एक इमारत में पहुंचे। इमारत में कई ढेर सारे कमरे थे सभी कमरों में अच्छी रौशनी थी, देखकर लग रहा था कि किसी अमीर व्यक्ति की ईमारत है।

रामू अपने बेटे से बोला – आज हम इस ईमारत में चोरी करेंगे, मैंने इस जगह पहले भी कई बार चोरियाँ की है और खूब माल भी मिलता है इस जगह पर।


 लेकिन उसका बेटा लगातार हवेली के आगे लगी लाइटों देखे जा रहा था। रामू बोला – अब देर ना करो जल्दी अंदर चलो नहीं तो कोई हम दोनों को देख लेगा। लेकिन बेटा अभी भी हवेली की रौशनी को निहारे जा रहा था और वो करुणमयी स्वर में बोला – पिता जी मैं चोरी कभी नहीं कर सकता।

रामू – तेरा दिमाग तो सही  है ना जल्दी अंदर चल।

बेटा – पिता जी, जिसके यहाँ से हमने कई बार चोरी की है देखिये आज भी उसकी ईमारत में रौशनी ही 
रौशनी है, और हमारे घर में आज भी अंधकार है। मेहनत और ईमानदारी के धन से इनका घर आज भी रौशन है, और हमारे घर में पहले भी अंधकार था और आज भी है।


 मैं ईमानदारी और मेहनत से कमाई करना चाहता हूँ, और उस धन के दीपक से मेरे घर में भी प्रकाश होगा। मुझे जीवन में अंधकार भरने वाला काम कभी नहीं करना। रामू की आँखों से आंसू निकले जा रहे थे। उसके बेटे की पढाई भी आज सार्थक होती दिख रही थी।

 दोस्तों ! बेईमानी और चोरी से आदमी कुछ पल के लिए तो सुखी रह सकता है, लेकिन उसके जीवन में सदा के लिए पाप और अंधकार भर जाता है। हमेशा अपने काम को मेहनत और ईमानदारी से करना चाहिए। 


 बेईमानी की कमाई से बने पकवान भी ईमानदारी की सुखी रोटी के आगे फीके हो जातें हैं।

Thursday, 5 January 2017

इच्छाशक्ति

इच्छाशक्ति


अपने शरीर के कुरूपता के कारण सैमुअल जॉनसन को
किसी भी स्कूल पढने के लिए नौकरी नहीं मिली। बचपन से साथ चली आ रही निर्धनता ने पल्ला नहीं छोड़ा। अंततः उन्होंने नौकरी की आशा ही छोड़ दी औऱ वह पढाई में फिर से लग गए। मेहनत और मजदूरी करके वे अपना गुजारा करते रहे। कुछ ही समय बाद उनकी मेहतन ने चमत्कार दिखाया और एक श्रेष्ठ विद्वान साहित्यकार के रूप में इंग्लैण्ड में ख्याति प्राप्त हुई।

जॉनसन का अंग्रेजी विश्व कोष, दुनिया आज भी एक अमूल्य कृति मानती है। ऑक्सफोर्ड विश्व विद्यालय ने उनकी सेवाओं के लिए उन्हें ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि की। 


   ‘टाम काका की कुटिया’ की प्रसिद्ध लेखिका हैरियट
स्टो को परिवार का खर्च चलाने तक के लिए कठिन श्रम करना पड़ता था, गरीबी और मुश्किलों के बीच घिरे रहकर भी उन्होंने थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर पुस्तक पूरी की। अन्तःप्रेरणा से अभिप्रेरित होकर लिखी गयी इनकी यह पुस्तक अमेरिका में गुलामी प्रथा के अन्त के लिए वरदान साबित हुई।

 ये दोनों उदाहरण इसके प्रमाण हैं कि सफलता के लिए परिस्थितियों का उतना महत्व नहीं है जितना कि स्वयं की इच्छाशक्ति और मनःस्थिति का। आशावादी दृष्टिकोण, संकल्पों के प्रति सत्यता और आत्मविश्वास बना रहे और प्रयास हमेशा चलता रहे तो लक्ष्य की प्राप्ति कर सकना सभी के लिए संभव है।