डर पर विजय – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी

 🔥 डर पर विजय – स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरक कहानी

जब स्वामी विवेकानंद जी संन्यास लेने के बाद भारत भ्रमण कर रहे थे, तब वे कई जंगलों और दूर-दराज़ के इलाकों से होकर गुजरते थे। एक बार वे एक ऐसे जंगल से गुजर रहे थे जहाँ डाकुओं और जंगली जानवरों का बहुत डर माना जाता था।


गाँव वालों ने उन्हें रोकते हुए कहा,

“महात्मा जी, उस रास्ते से मत जाइए, वहाँ बहुत खतरा है।”

लेकिन स्वामी विवेकानंद जी शांत भाव से मुस्कुराए और बोले,

“जिसके मन में भय है, वही हारता है। डर बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है।”

वे बिना रुके उसी रास्ते पर आगे बढ़ गए।

जंगल में चलते समय उन्होंने देखा कि कुछ लोग भय से काँप रहे हैं। स्वामी जी ने उनसे पूछा,

“तुम लोग इतने डरे क्यों हो?”

लोगों ने कहा,

“स्वामी जी, हमें लगता है कोई हमें नुकसान पहुँचा देगा।”

स्वामी विवेकानंद जी ने दृढ़ स्वर में कहा,

“तुम आत्मा हो, शरीर नहीं। आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता।”

उनके शब्दों में इतना आत्मविश्वास था कि लोगों का डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा।

कहते हैं, उस जंगल में आगे चलकर न कोई डाकू मिला, न कोई खतरा।

🌟 कहानी से सीख

डर सबसे बड़ी कमजोरी है

आत्मविश्वास से बड़ा कोई हथियार नहीं

जब मन मजबूत होता है, तो परिस्थितियाँ अपने आप कमजोर हो जाती हैं

जो व्यक्ति सत्य और साहस के मार्ग पर चलता है, उसकी रक्षा स्वयं शक्ति करती है

✨ आज के जीवन के लिए संदेश

आज हम छोटी-छोटी समस्याओं से डरकर रुक जाते हैं—

कभी असफलता का डर,

कभी लोगों की राय का डर।

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं:

“निडर बनो, यही सबसे बड़ी साधना है।”

🔔 निष्कर्ष

यह कहानी हमें सिखाती है कि

डर को जीत लो, दुनिया खुद-ब-खुद जीत में बदल जाएगी।

जो व्यक्ति अपने भीतर विश्वास जगा लेता है, उसके रास्ते की हर बाधा हट जाती है।

👉 डर छोड़िए, विश्वास अपनाइए — यही स्वामी विवेकानंद जी की सच्ची शिक्षा है।

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