पहले रोटी, फिर धर्म

 पहले रोटी, फिर धर्म

एक दिन स्वामी विवेकानंद जी भारत भ्रमण के दौरान एक गरीब बस्ती से गुजर रहे थे। चारों ओर गरीबी, भूख और लाचारी साफ़


दिखाई दे रही थी। उसी बीच उन्होंने एक कमज़ोर और भूखे बालक को सड़क किनारे बैठा देखा। उसके चेहरे पर दर्द था, आँखों में आँसू और शरीर में बिल्कुल भी ताकत नहीं।

स्वामी जी रुके। उन्होंने उससे पूछा,

“बेटा, क्या हुआ?”

बालक ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

“महाराज, दो दिन से कुछ खाया नहीं है… भूख बहुत लग रही है।”

स्वामी विवेकानंद जी का हृदय भर आया। उनके साथ कुछ लोग थे, जो धर्म और अध्यात्म पर चर्चा करना चाहते थे। लेकिन स्वामी जी ने पहले अपना भोजन उस बच्चे को दे दिया।

जब बालक ने खाना खाया, उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। उसकी आँखों में चमक आ गई।

तब स्वामी विवेकानंद जी ने कहा—

“भूखे पेट भगवान की बातें करना पाखंड है।

पहले रोटी दो, फिर धर्म की बात करो।”

वे आगे बोले,

“जिस देश में लोग भूखे हों, वहाँ सच्चा धर्म सेवा और करुणा है, केवल उपदेश नहीं।”

उनका मानना था कि ईश्वर मनुष्य में ही वास करता है, और भूखे, दुखी, पीड़ित लोगों की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।

🌼 कहानी से सीख

सच्चा धर्म मानव सेवा है

करुणा बिना शर्त होनी चाहिए

पहले इंसान की ज़रूरतें, फिर ज्ञान की बातें

कर्म ही सबसे बड़ा उपदेश है

✨ आज के समय के लिए संदेश

आज हम अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन सामने खड़े ज़रूरतमंद को अनदेखा कर देते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी सिखाते हैं कि—

👉 अगर किसी का पेट भर सको, तो वही सबसे बड़ा धर्म है।

👉 अगर किसी का दर्द समझ सको, तो वही सच्चा ज्ञान है।

🔔 निष्कर्ष

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि

धर्म मंदिरों में नहीं, बल्कि इंसानियत में बसता है।

और इंसानियत की सबसे सुंदर भाषा है — सेवा।

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