कॉकरोच नहीं, हमारी प्रतिक्रिया समस्या होती है.
एक रेस्टोरेंट में अचानक एक कॉकरोच उड़ता हुआ आया और पास बैठी एक महिला की कलाई पर जा बैठा। महिला घबरा गई। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी, उछलने लगी और इधर-उधर हाथ मारने लगी— “कॉकरोच… कॉकरोच…!” उसकी घबराहट देखकर उसके साथ बैठे लोग भी डर गए। माहौल में एक पल में अफरा-तफरी फैल गई। डर का संक्रमण हड़बड़ी में महिला ने तेज़ी से हाथ झटका और कॉकरोच उड़कर पास बैठी दूसरी महिला के ऊपर जा गिरा। अब दूसरी महिला चिल्लाने लगी। कुछ ही सेकंड में पूरा रेस्टोरेंट चीख-पुकार और घबराहट से भर गया। एक अलग प्रतिक्रिया थोड़ी दूरी पर खड़ा एक वेटर यह सब देख रहा था। वह मदद के लिए आगे बढ़ा ही था कि तभी कॉकरोच उड़कर उसके कंधे पर बैठ गया। लेकिन— वेटर न तो चिल्लाया, न घबराया, न ही इधर-उधर भागा। वह बिल्कुल शांत खड़ा रहा। उसने ध्यान से कॉकरोच की हरकतों को देखा, सही समय का इंतज़ार किया और पास रखे नैपकिन से उसे पकड़कर आराम से बाहर फेंक दिया। असली सवाल मैं यह सब पास बैठकर देख रहा था। और...