ओशो के विचारों से (बोध कथा)


संध्या काल में, एक व्यक्ति अपने घर की ओर प्रस्थान कर रहा था। घर की ओर जाते-जाते उसे देर हो गयी, अँधेरा होने लगा अब तो उसे दिखाई भी देना बंद हो गया। उस भयानक जंगल में उसे दिशा भ्रम भी होने लगा, वह घबराकर तेजी से चलने गला। डर से उसे प्यास और भूख भी लगने लगी थी। चलते चलते उसका पैर गहरे कुँए में फिसल गया, उसके ह्रदय की धड़कने अचानक से तेज़ हो गयी। कुँए में आधी दूरी पर गिरते ही उसके हाथ में एक पेड़ की टहनी आ फँसी, उसने उसे अचानक से पकड़ लिया। विपत्ति अभी इतनी ही नही थी, उसने जब नीचे देखा तो पाया कि तीन अजगर नीचे से फुंफकार रहे है, उसके तो पसीने पसीने से हाथ भी तर होने लगे, इतना ही नही, दो चूहे आ कर अब डाल को कुतरना शुरू कर दिए। उसकी जान तो सूखने लगी अब क्या होगा ? ईश्वर को याद करने लगा। अब कुछ ही समय में हाथी आ कर पेड़ को हिलाने लगा वह अब वह चारों ओर से परेशानियों से घिर गया। उसकी टहनियों के ऊपर मधुमखियों का छत्ता लगा हुआ था, हिलने के कारण उसमें से एक एक शहद उसकी नाक पर गिरा , अब अगला शहद गिरने ही वाला था तो उसने अपना मूंह खोला और शहद का आनंद लेने लगा। उस स्थिति में वह सब परिस्थितियां भूल चूका था।
     संध्या काल में भगवन शिव और पार्वती जी अपने वाहन पे सवार हो कर भ्रमण के लिए निकले थे। अचानक उन्हें एक व्यक्ति के विपत्ति में होने की भनक लगी और वे वहाँ पहुँच गये। स्थितियां देखी, तो सारी बातों का पता चल गया। पर्वती जी ने भगवन शिव से, उस व्यक्ति की सहायता के लिए आग्रह किया। भगवान ने उसे हाथ बढ़ाने के लिए कहा, परन्तु वह तो अपने आनंद में सब कुछ भूल चुका था। कई बार कहने के बाद भी वह हाथ नहीं बढ़ाया और भगवान शिव और पार्वती जी वहाँ से चले गये।
     वह व्यक्ति जिस वन में जा रहा था, वह दुनिया रुपी वन था, और अँधेरा अज्ञानता का प्रतीक था। वह पेड़ की डाली आयु है, जिसे, दिन-रात रुपी चूहे उसे कुतर रहें है। और मदमस्त घमंडी हाथी उसे उखाड़ने में लगा हुआ है। शहद की बूँद सांसारिक सुख के समान है, जिसके कारण मनुष्य अपने आस पास के खतरों को अनदेखा करता रहता है। सुख की माया में खोये मन को भगवान भी नहीं बचा सकते।   


टिप्पणियाँ