स्वामी विवेकानन्द

 युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द


 स्वामी विवेकानन्द जी को विदा हुए 118 साल हो चुके हैं, परन्तु आज

भी उनका चित्र देश में सबसे आसानी से पहचाने जाने वाली छवियों में से हैं। एक बहुत ही बड़ी संख्या में युवा उन्हें अपना प्रेरणाश्रोत मानते हैं, उनकी छवि को अपनी पढ़ाई की मेज पर रखते हैं। मात्र 39 वर्ष जीने वाले इस सन्यासी का भारत पर इतना गहरा प्रभाव क्यों है? 12 जनवरी 1863 को जन्में स्वामी जी की 158वीं जयंती पर यदि हम इस प्रश्न का उत्तर तलाशने का प्रयास करें तो हमें यह ध्यान आता है कि स्वामी जी के विषय में 


सामान्यतः सभी लोगों को यह तो पता ही है कि वे रामकृष्ण परमहंस जी के शिष्य थे और 1893 के शिकागो के विश्व सर्व धर्म सम्मलेन में उन्होंने हिन्दू धर्म की सनातन परंपरा को अपने ऐतिहासिक भाषण के माध्यम से प्रस्तुत किया था जिससे पूरा पश्चिमी विश्व चकित हुआ था।


 लेकिन कम ही लोगों को यह मालूम होगा कि महाकवि रविंद्रनाथ टैगोर स्वामी जी के बारे में यह कहते थे कि, 'यदि भारत को जानना है तो स्वामी विवेकानंद को पढ़ो'। यह भी कम लोगों को ही मालूम होगा कि गाँधी जी ने कहा था कि, 'स्वामी विवेकानंद जी को पढ़ने के बाद भारत के प्रति मेरी भक्ति एक हजार गुना बढ़ गयी।

 

जब ऐसे लोग जिन्हें स्वयं ही महामानव कहा जाता है यदि उन्होंने किसी के विषय में इतनी बड़ी बातें कही हों उस कोटि के व्यक्तित्व को हमारे देश को और ठीक से परिचित कराने की आवश्यकता थी। लेकिन भारतीय अकादमिया और नीति नियंताओं ने लम्बे समय तक सेकुलरवाद की राजनीति के चलते स्वामी विवेकानंद जैसे युगद्रष्टा को मात्र एक साधारण धार्मिक सन्यासी में परिवर्तित किया और उनके विचारों के दर्शन के आधार पर कोई विशेष शोध और प्रचार नहीं होने दिया। वे एक योद्धा सन्यासी थे जिन्होंने अंग्रेजी शासन में बंधे हुए भारतवासियों को राष्ट्रीयता का बोध कराया और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति अनुराग और प्रतिबद्धता पैदा की थी।


 स्वामी विवेकानन्द जी जब विदेश गये तो यूरोपीय और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के विद्वान, जो भारत के विषय में बहुत खराब धारणा रखते थे और भारतीयों को 'आदिम' और 'असभ्य कहते थे वे इस युवा भिक्षु के तर्कों के आगे नतमस्तक हुए थे।


स्वामी विवेकानन्द जी ने भारत के पुनरुत्थान को ही विश्व शांति और बन्धुत्व का एकमेव विकल्प बताया था। आज जब वैश्विक शांति अभूतपूर्व रूप से शक्तिशाली चुनौतियों का सामना कर रही है, तो वैश्विक मानवतावाद' के सबसे बड़े प्रवक्ता स्वामी विवेकानंद की ओर देखने की आवश्यकता है। 


ऐसा लगता है कि मानवता को नैतिक विचारों और करुणा के मूल्यों के एक नए प्रवाह की जरुरत है जो स्वामी जी ही दे सकते हैं। भारतीय सभ्यता उच्च मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा भंडार है, और स्वामी विवेकानंद में ही हम इन मानवीय मूल्यों की सबसे संवेदनशील अभिव्यक्ति पाते हैं। संभवतः इसी कारण से भारतीय मन बड़ी सरलता से स्वामी विवेकानंद जी से जुड़ाव का अनुभव कर लेता है।



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