मुस्कान

मैं  देख कर भावुक था  ,
आप  की मुस्कान पर  |
निःस्चल निर्द्वंद  हंसी थी ,
मैं मोहित था जिस पर |
इस दृढ़ समाज मे,
चकित था मुस्कान पर |
जन कुटिलता ने दी थी ,
वो अद्भुत मुस्कान पर !
मै बहुत चकित था ,
उस अभिनव मुस्कान पर |
सम हृदयी स्वाभिमान था ,
उस बाहुल्य स्वरों पर |
मेरा अपना भी स्वाभिमान था ,
व्यक्त न हो पाया पर |
दर्शनीय मैं भी था ,
श्रवणीय न हो पाया पर |
                    -    विकास पाण्डेय
                     -    २/११/२०१४


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