क्यो (why)

परिचय
 ज़रा खुद पे नज़र डालो. आप किस ब्रांड के कपडे पहनते हो? किस तरह के

जूते या बैग लेते हो ? आप क्या नाश्ता करते हो? आज सुबह आपने किस शैम्पू से बाल धोये? सबसे ज़रूरी बात कि आप ये सब प्रोडक्ट्स क्यों लेते हो ? आप शायद बोलेंगे कि सस्ता या अच्छी क्वालिटी का होने की वजह से आप कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल करना पसंद करते है.
लेकिन क्या आपको पता है कि आपके कपड़ो और जूतों से ही आपकी पहचान होती है. आपकी लाइफ स्टाइल आपकी पर्सनेलिटी सब कुछ आपके पहनावे से झलकता है. इसलिए जो कुछ भी आप इस्तेमाल करते है उसके पीछे एक ख़ास वजह होती है.
लोग वो नहीं खरीदते जो आप बनाते है बल्कि आप क्यों बनाते है सिर्फ इस पर वो ध्यान देते है “ People don’t buy what you do, they buy why you do it.”
एप्पल कहता है “कुछ अलग सोचो” एप्पल के सारे प्रोडक्ट्स के पीछे sirf यही सोच है. एप्पल की कंपनी ने 1984 से अपना स्लोगन चेंज नहीं किया kyunki. यही baat एप्पल को सक्सेसफुल बनाती है. क्योंकि उनके पास एक क्लियर “वाय” है यानि एक क्लियर reason है. इसका मतलब कि कंपनी का पर्पज एकदम क्लियर है. इसलिए तो एप्पल अभी तक चल रहा है और सक्सेसफुल चल रहा है. ये लोगो को कुछ अलग सोचने के लिए inspire करता है.
क्या आपके पास भी ऐसा क्लियर वाय का सेन्स है ? क्या aapka भी कोई पर्पज है जिसे लेकर आप अपने सारे काम करते है ? सक्सेसफुल होने के लिए आपको इसी वाय से स्टार्ट करना पड़ेगा. अगर आपको एक अच्छा लीडर बनना है तो आपको ek ‘वाय से स्टार्ट करने की ज़रुरत पड़ेगी.
मेनीपुलेशन Versus इन्स्पाइरेशन
जितने भी ग्रेट लीडर्स आप जानते है उनके बारे में ज़रा सोचिये. उन्हें देख के ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो पैदा ही लीडर बनने के लिए हुए है ? शुक्र है कि एक तरीका है जिससे हम उनके जैसे बन सकते है. उनके सोचने, काम करने और बात करने के तरीके में एक पैटर्न है और हमें वही पैटर्न सीखना है. फिर हम सीख सकते hai कि लीडर कैसे बना जाए ?
मार्टिन लूथर किंग एक ग्रेट लीडर हुआ जिसने लाखो लोगो को इंस्पायर किया था. उनकी स्पीच सुनने के लिए अगस्त 28,1963 में हज़ारो लोगो ने वाशिंगटन डी.सी. तक paidal chal kar aaye
इस स्पीच के लिए किसी को कोई इनविटेशन नहीं भेजा गया था फिर भी बड़ी तादाद में लोग आते जा रहे थे. वहां हर जाति, हर रंग के लोग मौजूद थे. किंग ने अपने पॉवरफुल वर्ड्स में कहा ”मेरा एक सपना है”. सब उनकी स्पीच सुनकर इतने इंस्पायर हुए कि इक्वल राइट्स के लिए लड़ने को तैयार हो गए. और उन सबकी कोशिश रंग लायी जिसने अमेरिका का इतिहास ही बदल कर रख दिया था.
ऐसा नहीं है कि सभी लीडर्स हमें इंस्पायर करे. कई ऐसे भी लीडर हुए है जिनको लोग डर और पनिशमेंट की वजह से follow करते थे या फिर किसी लालच की वजह से. पर सच्चे लीडर तो स्पेशल होते है. उनमे कोई तो खास बात होती है जिसे हर कोई नक़ल नहीं कर सकता. और उनकी खूबी की वजह से ही उनके लाखो follower होते है.
आप कैसे दुसरो से काम करवा सकते है? इसने दो तरीके है. या तो आप उन्हें manipulate करे या उन्हें inspire. अक्सर पोलिटिकल और बिजनेस लीडर लोगो को manipulate ही करते है.
वोट के लिए नेता डर का माहौल तक क्रियेट कर सकते है. झूठे वादे करके और दबाव डालकर वोट हासिल करने के लिए ऐसे नेता कुछ भी कर सकते है. जैसे कई बार सेल्स बढ़ाने के लिए कंपनी अपने price कम कर देती है, नए प्रोडक्ट्स निकालती है और प्रोमोस देती है.
चलिए, मोटोरोला के RAZR model को ही le लेते है. ये फ्लिप टॉप मोबाइल फोन 2004 में रिलीज़ हुआ था जिसके 50 मिलियन सेट मोटोरोला ने बेचे. कई होल्लीवुड सेलेब्रिटीज़ और प्राइम मिनिस्टर ने भी ये मोबाइल खरीदा था. कुल मिलाकर मोटोरोला का ये प्रोडक्ट बहुत सक्सेसफुल रहा था.
हालांकि 4 साल में ही कई कंपनीज ने कॉम्पीटीशन में RAZR के ही वर्ज़न निकाल दिए थे. उन्होंने नए फ़ोन रिलीज़ किये जिसमें RAZR से भी बढ़िया फीचेर्स थे. ज़ाहिर बात है कि अब मोटोरोला का मार्किट ठंडा पड़ गया था. RAZR बस एक नोवेल्टी प्रोडक्ट था. ये कोई इन्नोवेशन नहीं थी.
फैक्स मशीन, माइक्रोवेव अवन, लाईट ब्लब और आई ट्युन्स को सही मायने में इनोवेशन कहा जाएगा. ये वो प्रोडक्ट्स है जिन्होंने पूरी इंडस्ट्री ही चेंज कर दी है. या यूँ कह ले कि सोसाइटी ही चेंज कर दी है.
नोवेल्टी कोई इनोवेशन नहीं होती बस एक तरह का मेंनीप्यूलेशन है. बेशक मोटोरोला ने RAZR को लाखो लोगो को बेचा मगर सिर्फ शोर्ट टर्म के लिए. जिन्होंने ये प्रोडक्ट खरीदा अब ज़रूरी नहीं कि आगे भी सारे मोटोरोला के प्रोडक्ट ही खरीदेगे. क्योंकि कंपनी के लिए उनकी कोई Loyality नहीं है.
Manipulation क्रियेट करना बहुत Ineffective है. प्राइस गिरा दो, प्रोमोशन करो और incentivesदो, ये सब बहुत खर्चे का काम है. फिर भी इसका इफ़ेक्ट बस कुछ ही टाइम तक रहता है. इसलिए मेनीप्युलेशन करके अपना काम निकलवाना किसी भी कंपनी और ओर्गेनाइजेशन को कमज़ोर कर देता है.
द गोल्डन सर्कल
जो सच्चे लीडर होते है, वो कभी मेंनिप्युलेशन नहीं करते. वे INSPIRE करते है. यहाँ हम आपको एक इफेक्टिव तरीका बता रहे है जिससे आप भी ग्रेट लीडर्स की तरह लोगो को INSPIRE कर पाएंगे. इस कोंसेप्ट को गोल्डन सर्कल कहा जाता है.
ये गोल्डन सर्कल Human Behavior के पैटर्न को Explain करता है. इससे हम अपने एक्शन के पीछे की वजह समझ सकते है. और ये हमारे लिए हमेशा एक स्ट्रोंग रीमाइंडर की तरह काम करता है कि कुछ भी शुरू करने से पहले हम खुद से पूछे “क्यों”. हम ये क्यों कर रहे है ?
क्यों बाइक Riders अपनी बॉडी में Harley Davidson के logo का टेटू बनवाकर घूम रहे होते है ? क्या आपने कभी सोचा है,एप्पल इतना कैसे ट्रांसफॉर्म हो गया ? सबसे पहले उन्होंने कंप्यूटर बनाये फिर गेजेट्स और मोबाइल फोन बेचने शुरू कर दिया. उनका पर्पज क्लियर था इसीलिए हार्ले –डेविडसन और एप्पल दोनों सक्सेसफुल है. दोनों कम्पनियों ने “वाय” की सोच के साथ अपनी शुरुवात की.
अब हम इस गोल्डन सर्कल को लेते है. इसमें लिखा वर्ड “व्हट” यानि क्या…… उस सर्विस या प्रोडक्ट को रेफेर करता है जो कम्पनी ऑफर कर रही है. ये समझना बहुत आसान है किसी भी एम्प्लोयी या कस्टमर से पूछ लीजिये. सबको पता होता है कि कंपनी क्या ऑफर कर रही है..
अब दूसरा वर्ड आता है “हाउ” यानि कैसे….. मतलब इस बात को समझना मुश्किल है कि “कैसे” कोई कंपनी अपने कोम्प्टीटर्स से अलग है. एक तरह से बोले तो बाकियों से कैसे बेहतर है ? ये “हाउ” उस “व्हट” के पीछे का प्रोसेस है जो कंपनी करती है. और “हाउ” उस कंपनी के डिसीजन मेकिंग को रेफेर करता है.
किसी भी कंपनी का पर्पज़ या “वाय” सिर्फ प्रोफेट कमाना नहीं है. प्रॉफिट तो बस एक रिजल्ट है. “वाय” रेफेर करता है उस बीलीफ को, उस कॉज को या उस पर्पज को जो कंपनी लेकर चलती है. क्यों वो कंपनी शुरू हुई थी? आखिर क्या वजह थी उसके पीछे ? क्यों उस कंपनी के एम्प्लोयीज़ काम करने के लिए मोटिवेट होते है. कस्टमर क्यों उस कंपनी का प्रोडक्ट खरीदे?
ज़्यादातर कंपनीज़ बाहर से अन्दर की तरफ कम्युनिकेट करती है. उन्हें क्लियर पता होता है कि वे क्या कर रही है. मगर जब वे इस गोल्डन सर्कल में गहराई से चली जाती है तो ये थोडा फजी हो जाता है. उनमे से ज़्यादातर ये एक्सप्लेन नहीं कर पाती कि वे कैसे काम कर रही है. एक तरह से उन्हें पता ही नहीं होता कि कंपनी की शुरुवात आखिर किसलिए की गई थी. कंपनी का मेन पर्पज़ क्या है इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं होता है.
यही बात इंडीविज्युएल के साथ भी है और लीडर के साथ भी. सिर्फ वही कंपनी, लीडर और लोग सक्सेसफुल हो पाते है जिन्हें इस “वाय” के बारे में पता होता है. दुसरो को इंस्पायर करने के लिए आपको पहले खुद के लिए एक पर्पज़ ढूंढना पड़ेगा.
एप्पल इंक. एक ऐसी कंपनी है जो इनोवेशन करती है. अपने आई-पोड और आई- ट्युन्स से इसने म्यूजिक इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया था और आई-फोन लांच करके मोबाइल फोन की दुनिया में रेवोल्यूशन ला दिया.
अगर एप्पल भी कोई आम कंपनी होती तो ये भी अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग “व्हट” से करती और कहती हम बढ़िया कंप्यूटर बनाते है, जो देखने में सुन्दर है, सिंपल है और यूजर फ्रेंडली है, क्या आप खरीदना चाहेंगे? “
ये तो टीपिकल सेल्स पिच है जो सब करते है मगर नहीं, एप्पल ने इसे सबकी तरह नहीं किया. कंपनी इनसाइड आउट से शुरू हुई. ये एप्पल के कम्युनिकेट का तरीका था. उनके लिए “वाय” हमेशा सबसे पहले आता है.” जो भी हम करते है उसमे स्टेटस क्यू बदलने की कोशिश करते है क्योंकि हम औरो से अलग सोचते ह “.
इसलिए तो एप्पल बाकी के कॉम्पटीटर्स से सबसे आगे है. ये क्लियर है कि एप्पल का “वाय” यानि पर्पज यही है कि वो स्टेटस क्यू को चेलेंज करना चाहता है और कुछ हटकर सोचना चाहता है. उनके एडवरटीज़मेंट में भी यही बात साफ़ होती है. और यही वजह है कि एक स्ट्रोंग पर्पज़ को लेकर चलने वाली एप्पल कंपनी हमेशा क्वालिटी के प्रोडक्ट्स बनाती है.
हालत ये है कि कंपनी को सिर्फ कस्टमर्स की ही नहीं बल्कि अपने एम्प्लोयीज़ की भी लोयलिटी मिली है.  ये भी एक रीजन है कि एप्पल ने कम्प्यूटर के अलावा इतने एमपी3 और मोबाइल फ़ोन भी बेचे है. इस सबके सेंटर में एप्पल का “वाय” यानि उसका पर्पज ही है जो काम कर रहा है.
क्या आपको ये बात मालूम है कि असल में एमपी3 एप्पल ने नहीं बनाया था ? इसे क्रिएटिव टेक्नोलोजी लिमिटेड सिंगापोर ने बनाया था. लेकिन फिर एप्पल ने कैसे इसका मार्किट कब्ज़े में ले लिया ?
क्रिएटिव ने ये प्रोडक्ट “5जीबी एमपी 3 प्लेयर के रूप में एडवरटीज़ किया था. मगर एप्पल ने कहा” आई-पोड आपकी जेब में 1,000 गाने है”. क्रिएटिव ने मार्किट को बताया कि प्रोडक्ट “क्या” है पर एप्पल ने मार्किट को बताया कि ‘क्यों” कस्टमर को आई-पोड खरीदने की ज़रुरत है. याद रखिये लोग ये नहीं देखते कि आपके पास “क्या” है, वो देखते है कि आपके पास “क्यों “ है.
क्या आप जानते है कि डैल ने अपना खुद का एमपी3 प्लेयर 2003 में निकाला था. मगर ये उतना सक्सेसफुल नहीं हुआ क्योंकि सबको पता था कि डेल कंप्यूटर बनाती है, और डेल से कोई एमपी3 या मोबाइल खरीदना सही आइडीया नहीं लगता. कुछ सालो बाद डेल ने डीसाइड किया कि वे अपने कोर बिजनेस में ही फोकस करेंगे.
वही दूसरी तरफ हमें पता है कि एप्पल एक ऐसी कंपनी है जो औरो से हटकर सोचती है. एप्पल इनोवेशन करती है. ये अपने प्रोडक्ट से इंडस्ट्री बदल देती है. मतलब जो चला आ रहा है उसमे ये बदलाव कर देती है.   एक तरह से ये नार्मल को चेलेंज करती है. और अपने कस्टमर को यूज़र फ्रेंडली प्रोडक्ट देती है.
हम जानते है कि “वाय” की सोच लेकर एप्पल काम करती है ना कि ‘व्हट” के साथ. जब एप्पल बनी तो इसका लीगल नाम था एप्पल कंप्यूटर्स इंक. लेकिन कंपनी ने 2007 में अपना नाम बदल के सिर्फ एप्पल इंक कर लिया था. क्योंकि एप्पल कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी से कहीं बढ़कर थी.
कुछ अलग सोचने की सीख सबसे पहले एप्पल ने दी थी. ये उनका पर्पज़ था. उनका ये “वाय” हमेशा रहेगा चाहे “व्हट” कुछ भी हो. एप्पल ने वो कर दिखाया जो एचपी और डेल नहीं कर पाए.
एप्पल ने आई- पोड बनाकर छोटी इलेक्ट्रोनिक इंडस्ट्री में कदम रखा. इसका कोम्प्टीशन सोनी और फिलिप्स के साथ था. एप्पल ने मोबाइल फोन्स का ट्रेंड ही चेंज कर दिया था. एप्पल के आई-फोन की वजह से ही नोकिया, मोटोरोला और एरिक्सन ने भी अपने टच स्क्रीन वाले डिवाइस निकाले. एचपी और डेल ने भी कोशिश की मगर चले नहीं तो फिर अपने कंप्यूटर बनाने तक ही रहे.

ये ओपिनियन नहीं है, ये बायोलोजी है
 बेलोंगिंग का सेन्स हम इंसानों में पैदाइशी होता है क्योंकि हम हमेशा सेफ और सीक्योर फील करना चाहते है. ये हम सब की बेसिक नीड है. हम कभी जब छुट्टियों में विदेश जाते है तो वहां अपने देश के लोगो को देखकर हमें अच्छा लगता है. क्योंकि उन्हें देखकर हमें अपने घर की याद आती है.
इसी तरह जो कंपनी हमारी तरह सोचती है हम उसके साथ एक बेलोंगिंग फील करते है. हम उनके प्रोडक्ट लेते है क्योंकि हमारा और उनका एक ही “वाय” होता है. मतलन जिसमे हम बिलीव करते है कंपनी भी करती है.
“ये प्रोडक्ट्स और ब्रांड हमें खुद से जोड़ते है” और हम कंपनी के साथ कनेक्टेड फील करते है और उन कस्टमर के साथ भी जो सेम प्रोडक्ट यूज़ करते है.
“वाय” से शुरुवात करना ज्यादा ज़रूरी है क्योंकि इंसान फीलिंग्स के हिसाब से ही सब कुछ करता है. उए गोल्डन सर्कल बहुत इफेक्टिव है क्योंकि ये हमारे दिमाग के मेजर लेवल से रिलेट करता है.व्हट” लेवल हमारे दिमाग के नियोकोर्टेक्स के साथ कोरोस्पोंड्स करता है. हम जो भी लेंगुएज बोलते समझते है या जो कुछ सोचते है वे सब इसी नियोकोर्टेक्स से कंट्रोल होता है.
“हाउ” और “व्हट” लेवल लिम्बिक ब्रेन के साथ कोरोस्पोंड करते है. जिसका मतलब है कि हमारी डीसीजन मेकिंग और बेहेवियर सब इसी लिम्बिक ब्रेन से कंट्रोल होता है. मगर ये लिम्बिक ब्रेन वर्ड्स फॉर्म नहीं कर सकता, ये खुद को फीलिंग्स से एक्सप्रेस कर सकता है. दिमाग के इसी हिस्से में ट्रस्ट और लोयलिटी जैसी फीलिंग्स होती है.
जब कोई कंपनी “व्हट” के साथ अप्रोच करती है, यानि वो क्या प्रोडक्ट बेच रही है, तो हमारा दिमाग का नियोकोर्टेक्स वाला हिस्सा रेस्पोंस करता है. हम उस प्रोडक्ट के बारे में सोचने लगते है कि उसमे क्या-क्या फीचर्स है, कैसा दीखता है, डीजायन कैसा है वगैरह वगैरह. मगर जब कोई कंपनी “वाय” के साथ अप्रोच करती है तो वो हामरे लिम्बिक ब्रेन को अपील कर रही होती है.
तब ये इम्पैक्ट स्ट्रांगर होता है क्योंकि इसका मतलब है वो हमारी फीलिंग्स को अपील कर रही है. हम अपनी फीलिंग्स को रेशनलाइज नहीं कर सकते. हम कोई प्रोडक्ट सिर्फ उसके गुड लुक की वजह से नहीं खरीदते है बल्कि इसलिए खरीदते है क्योंकि हमें वो सही फील होता है.
जैसे उन लोगो की बात करते है जिन्हें स्टारबक्स पसंद है, वैसे तो मार्किट में सस्ते ब्रांड की कॉफ़ी भी मिलती है कुछ तो बढ़िया फ्लेवर और वेरायिटी वाली भी है मगर जो लोग स्टारबक्स के दीवाने है उनके लिए तो स्टारबक्स ही पहली और आखिर चॉइस है, उनके लिए वो कॉफ़ी से कहीं बढ़कर है क्योंकि वे अब उस ब्रांड के लॉयल कस्टमर बन चुके है. जब वे स्टारबक्स की कॉफ़ी पीते है तो उन्हें अच्छी फीलिंग आती है. स्टारबक्स का लोगो भी यही आइडिया देता है कि उसे पीने वाले आम लोग नहीं है, कुछ खास है. 
स्टारबक्स का “व्हट” उनकी कॉफ़ी है मगर उनका “वाय” या पर्पज़ लोगो को अपनी कॉफ़ी के पीने के लिए कम्फर्टेबल फील करवाना है, कुछ अच्छा फील करवाना है. दुसरे शब्दों में स्टारबक्स लोगो को सिर्फ कॉफ़ी नहीं पिलाता बल्कि अच्छा एक्स्पेरीयेंस फील करवाता है.
लोग वो नहीं खरीदते जो आप बनाते है बल्कि आप क्यों बनाते है सिर्फ इस पर वो ध्यान देते है
“People don’t buy what you do, they buy why you do it.”

हार्ले-डेविडसन “वाय” को लोगो तक पहुँचाने में एक्सपर्ट है. इसीलिए तो लोग उनकी कंपनी के लोगो का टेटू बनवाये घुमते है. कंपनी ने एक पॉवरफुल लोगो बनाया जो बीलीफ का सिम्बल बन गया है .
हार्ले ने इसे लगातार सालो की मेहनत, लगन और क्लेयरीटी से अचीव किया है. हार्ले- डेविडसन जो कहता और करता है उसमे बीलीव भी करता है. कंपनी ने अपने बनाये वेल्यूज़ को लेकर बरकरार है. ये कस्टमर से वही कम्युनीकेट करते है जिसपर ये बीलीव करते है.
धीरे-धीरे इनका लोगो कंपनी प्रोडक्ट के सिम्बल से कहीं बढ़कर बन गया. लोगो का मतलब ही अब बीलीफ हो गया है. रेंडी फावलर जिन्होंने हार्ले का टेटू बनवा रखा है, वे कहते है “ ये इस बात का सिम्बल है कि मै कौन हूँ यानी ये बताता है कि मै एक अमेरिकन हूँ”
“वाय” से कैसे शुरुवात की जाए Start with Why, But Know How
 ग्रेट लीडर्स जैसे बिल गेट्स के पास एक करिश्मा है क्योंकि उनके पास एक स्ट्रोंग पर्पज है. उनके पास क्लियर “वाय” है. महान लीडर्स के पास एक बड़ा विजन होता है जो पर्सनल से कहीं ज्यादा है. वे सिर्फ अपने बारे में नहीं बल्कि बहुत से लोगो की भलाई का सोचते है. बिल गेट्स मानते है कि हर प्रॉब्लम का हल निकाला जा सकता है क्योंकि वे ऑप्टीमिस्टिक है. वे मानते है कि अगर ओब्सटेकल हटा दिए जाए तो हर कोई अपना पूरा पोटेंशियल अचीव कर सकता है.
बिल गेट्स का ये भी मानना है कि अगर लोगो को यूजफुल टूल्स दे दिए जाए तो वे और भी प्रोडक्टिव हो सकते हैउनका विजन है कि हर घर में, हर डेस्क में एक कंप्यूटर हो.
उन्होंने अपना ये पर्पज माइक्रो-सॉफ्ट के साथ मिलकर आगे बढाया, बिल गेट्स ने पॉवर पॉइंट बनाया, एक्सेल और वर्ड बनाया ताकि लोग ज्यादा एफ़ीशियेंट और प्रोडकटिव बन पाए. विंडोज़ बनाकर उन्होंने लोगो को एक्स्ट्राआर्डिनरी चीज़े करने का मौका दिया. बिल गेट्स का विजन था कि टेक्नोलोजी के ज़रिये लोगो को एम्पॉवर किया जाए.
जब बिल गेट्स ने माइक्रो सॉफ्ट छोड़ा तो भी वे अपने विजन को लेकर चलते रहे. उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन बनाया. अब वे कोई सॉफ्टवेयर नहीं बनाते लेकिन अभी भी वे लोगो को अपना फुल पोटेंशियल अचीव करने में मदद कर रहे है. अभी भी वे लोगो को उनकी जिंदगी इम्प्रूव करने का मौका दे रहे है. बिल गेट्स इस बात पर यकीन करते है कि अगर गरीबो को अपोर्चुयुनिटी दी जाये तो वे अपनी जिंदगी सुधार सकते है. गेट्स ने केवल “व्हट” यानि वो क्या करते है बस वही बदला. मगर उनका असली पर्पज “वाय” और उनका विजन कभी नहीं बदलेगा. 
वो जो “वाय” जानते है उन्हें ज़रूरत है उनकी जिन्हें “हाउ” पता है
हमें गोल्डन सर्कल तो पता है. अब ऊपर जो कोन दिख रहा है वो किसी कंपनी या ओर्गेनाइज़ेशन का सिम्बल है. इसमें वही कोंस्पेट अप्लाई होता है जो गोल्डन सर्कल में है.
सीईओ कंपनी का लीडर होता है. वो कंपनी के लिए एक पर्पज रखता है उसके नीचे एक्जीक्यूटिव काम करते है जो सीईओ के “वाय” पे बिलीव करते है. उन्हें पता होता है कि कंपनी के पर्पज को यानी “वाय” को रिएलिटी में कैसे लाया जाए.    
ये “वाय” एक एबस्ट्रेक्ट चीज़ है ये कोई प्रोडक्ट नहीं है बल्कि एक यकीन है, एक बिलिफ है. और “हाउ” वो प्रोसेस है जो इस बीलीफ़ को रियल में बदलता है. “व्हट” कंपनी के प्रोडक्ट या सर्विसेस को रेफेर करता है .
जो “वाय” टाइप के वही लीडर्स कहलाते होते है उनके पास विजन होता है, एक क्लियर पर्पज होता है. और वे ऑप्टीमिस्टिक भी होते है. इन लोगो को यकीन होता है कि जो सपने देखे जाते है उन्हें पूरा किया जा सकता है.
“हाउ” टाइप के लोग रियलिस्टिक और ज्यादा प्रेक्टिकल होते है. वे जैसी दुनिया देखते है वही फील करते है. यही वो लोग होते है जो स्ट्रकचर बनाते है और काम निकलवाते है. मगर “वाय” लोगो अकेले कुछ नहीं कर सकते, इन्हें “हाउ” टाइप के लोगो की ज़रूरत पड़ती है.
वाल्ट और रॉय डिज्नी ब्रदर्स की बात करते है. वाल्ट डिज्नी एडवरटीज़मेंट के लिए एक कार्टून आर्टिस्ट का काम करते थे. फिर उन्होंने एनिमेटेड मूवीज बनाने के बारे में सोचा, 1923 में हॉलीवुड अभी अपने शुरुवाती दौर में ही था.
रॉय उन्जे 8 साल बड़ा था और बैंकर की जॉब कर रहा थारॉय अपने भाई वाल्ट की इमेजिनेशन और टेलेंट की तारीफ करता था लेकिन उसे पता था कि वाल्ट बिजनेस के बारे में कुछ नहीं जानता है. और वाल्ट रिस्क भी बहुत लेता था. जैसा कि बाकी “व्हाई ” टाइप की आदत होती है. वाल्ट हमेशा आने वाले कल में सपनो में खोया रहता था.
एक बायोग्राफर ने कहा है “वाल्ट डिज्नी ने सपना देखा, चित्र बनाया और इमेजिन किया, जबकि रॉय उसकी शैडो में खड़ा एक एम्पयार बना रहा था.” रॉय ने अपने बिजनेस और फाईनेंस के टैलेंट को यूज़ किया उसने वाल्ट के सपने को रियलिटी में बदलने के लिए उसकी मदद की. रॉय डिज्नी ने ब्युओना विस्टा कंपनी बनाई जो डिज्नी की फिल्मे डिस्ट्रीब्यूट करती थी.
रॉय डिज्नी की तरह ज़्यादातर “हाउ” टाइप फंक्शनल और सक्सेसफुल होते है मगर वे इस दुनिया को बदलने नहीं आते बल्कि “व्हाई’ टाइप आते है जैसे वाल्ट डिज्नी जो लोगो को इंस्पायर करते है. 
बिना “हाउ” टाइप के “व्हाई” टाइप के लोग कुछ नहीं कर सकते. उनकी इमेजिनेशन दम तोड़ देगी. अगर इन दोनों टाइप के बीच एक स्ट्रोंग पार्टनरशिप बन जाए तो ये दोनों मिलकर एक मिलियन –बिलियन डॉलर कंपनी बना सकते है,
                                                                                                   जब व्हाई क्लियर ना हो
सेम वाल्टन, वाल मार्ट के फाउंडर डिप्रेशन में बड़े हुए. उन्हें कड़ी मेहनत की वेल्यु मालूम थी. उन्होंने बेनटोनविल्ले, अर्कांसस में पहला वाल मार्क खोला था. तब ये बस एक रीटेल शॉप थी. तब वहां और भी कई रीटेल शॉप थी जहाँ कम प्राइस में सामान मिलता था. लेकिन वाल मार्ट ने सबसे ज्यादा तरक्की की और टॉप तक पहुंचा. आज वाल मार्ट की सेल्स कुल मिलाके हर साल $44 billion है.
लेकिन सेम वाल्टन के सक्सेस का सीक्रेट हार्ड वर्क और चीप प्राइस में नहीं है. वाल्टन के पास बड़ा कॉज था. उसके पास एक स्ट्रोंग बिलिफ था जो उसे मोटीवेट करता था. सेम वाल्टन लोगो में यकीन करते थे. उसका मानना था कि ‘ अगर वो लोगो का ध्यान रखेंगे तो लोग भी उनका ध्यान रखेंगे “जितना वाल मार्ट अपने एम्प्लोयीज़, कस्टमर, और कम्युनिटी को देते गए उतना ही उनके एम्प्लोयीज़, कस्टमर और कम्युनिटी उन्हें देती गई,
सेम वाल्टन वीकेंड्स पर भी काम करते थे. वे अपना पिक अप ट्रक यूज़ करते थे. उन्हें अपने सभी एम्प्लोयीज़ का बर्थ डे भी याद रहता था. सेम वाल्टन हमेशा हम्बल रहते थे. उन्होंने अपनी जिंदगी औरो की सर्विस में लगा दी. उनकी खुद की सालाना सेलेरी $350,000 से भी कम थी.
यही सेम वाल्टन का “व्हाई” था . वे लोगो की सेवा करना चाहते थे. ये पर्पज उनके खुद से ऊपर था यही वजह है जो वाल मार्ट इतना सक्सेसफुल हुआ है. वाल मार्क सेम वाल्टन के पर्पज को पूरा करने का जरिया है.
हालाँकि बॉन मेरो कैंसर की वजह से अप्रैल 5, 1992 में सेम वाल्टन की मौत हो गयी थी. उनके बड़े बेटे एस. रोबीसन वाल्टन, उनके बाद वाल मार्ट के चेयरमेन बने. रोबीसन ने कहा कि कंपनी की पालिसी, कंट्रोल और डाईरेक्शन में कोई चेंज नहीं आएगा. लेकिन ये सच नहीं है.
सेम के मरने के बाद वाल मार्ट में बहुत से चेंज आये. कई कस्टमर और एम्प्लोय्य्ज़ ने मिसट्रीट की कम्प्लेंट की. वाल मार्ट बंट गयी और उसका एक हिस्सा कोस्टको एक नया रीटेल शॉप बन गया. 
वो सीईओ जिसने सेम वाल्टन के बाद काम संभाला , उनके पर्पज को मेंटेन नहीं कर पाया. वाल मार्ट का “व्हाई” हर साल धुंधला होता चला गया. इसका मतलब अब कंपनी ने अपना पर्पज खो दिया है, अपनी रेपुटेशन खो दी है.
  2009 में माइकल टी. ड्यूक कंपनी के सीईओ बने जिनकी सालाना सेलेरी $5.43 मिलियन है.
कन्क्ल्यूजन
ग्रेट लीडर जैसे बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स, और सेम वाल्टन ने अपने ‘व्हाई” को एक पहचान दी. जब उन्होंने एप्पल, माइक्रो सॉफ्ट और वाल मार्ट छोड़ा तो उन कंपनीज में बड़ी प्रॉब्लम आनी शुरू हो गयी. क्योंकि वे अपना पर्पज भूल गई थी.
जो भी नया सीइओ बने वो ग्रेट लीडर से इंस्पायर हो ये ज़रूरी है. सिर्फ अच्छे क्रेडेन्शियल का होना काफी नहीं है. उसे भी उसी बात पर बीलीव करना होगा जिस पर कंपनी का फाउंडर करता था वर्ना कंपनी का पर्पज धुधला हो जाएगा और उसकी रेपुटेशन खो जायेगी.
“व्हाई” का लेसन हर कंपनी में गहराई से रूटेड होना चाहिए. इतनी गहराई से कि अगर फाउंडर ना भी रहे तो भी कंपनी उस पर्पज को लेकर आगे बढती रहे और सक्सेसफुल बनी रहे.
अब आप जान गए है कि व्हाई के साथ कैसे शुरुवात की जाए. अपना एक पर्पज सोचिये, आप किस पर बीलीव करते है ? वहां से अपना हाउ (प्रोसेस) लेकर चलिए और अपना व्हट (प्रोडक्ट) इस्टेबिलिश कीजिये. अपने व्हाई को फजी न होने दे. जो आप सोच रहे है, कर रहे है, कम्युनिकेट कर रहे उस पर ध्यान दे.  ध्यान रहे कि ये सब आपके पर्पज के साथ मैच करे
याद रखिये जिनका पर्पज उनसे बड़ा होता है वही ग्रेट सक्सेस हासिल करते है.

 Source- GIGL


टिप्पणियाँ